शनिवार, 17 जून 2023

*पूजै देवी देव नैं, गुण धारयाँ की आस*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू केई दौड़े द्वारिका, केई काशी जांहि ।*
*केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥*
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*गुर बचन अणप्रतीति कौ अंग ॥*
बषनां दूध साध की बाणी, सो हिरदै नहिं धारै ।
गलथणी छाला गल नीचै, मूरिष थोबा मारै ॥२७॥
बषनांजी कहते हैं, ब्रह्मनिष्ठ साधु महात्माओं की आत्मानुभवयुक्त वाणी दूध के समान है किन्तु परोक्ष-ज्ञानाभिमानी पंडित व संसारी उसके अनुसार उपदेश ग्रहण नहीं करते । वस्तुतः ऐसे पंडित और संसारियों की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसे कोई मूर्ख गलथणी(कई एक बकरियों के गले में स्तन जैसी चमड़ी लटकी रहती है, उसे गलथणी बकरी कहते हैं । याद रहे इन स्तनों में दूध नहीं होता) बकरी के गले में लटकने वाले स्तनों में मुँह मार कर(थोबा) दूध प्राप्त करने की आशा करता है ॥२७॥
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पूजै देवी देव नैं, गुण धारयाँ की आस ।
बषनां पूजि पुजावताँ, मूरिख गया निरास ॥२८॥
संसारी अज्ञानी लोग सच्चिदानंदघन परमात्मा को छोड़कर छोटे-मोटे देवी-देवताओं की सांसारिक भोग-विलास प्राप्त्यर्थ उपासना करते हैं और उन देवी=देवों जैसे गुणों = आचरणों को करके उनसे फल की आशा करते हैं । किन्तु सत्य जानिये, उन देवी-देवों के उपासकों का समय उनकी पूजा करने व कराने में ही व्यतीत हो जाता है और अन्त समय में उनके हाथ में कुछ भी शेष नहीं रहता । वे निराश = दुखी के दुखी ही रह जाते हैं ॥२८॥
(क्रमशः)

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