🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४३)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
===========
*३४३. परिचय । गज ताल*
*जब मैं रहते की रह जानी ।*
*काल काया के निकट न आवै, पावत है सुख प्राणी ॥टेक॥*
*शोक संताप नैन नहिं देखूं, राग द्वेष नहिं आवै ।*
*जागत है जासौं रुचि मेरी, स्वप्नै सोइ दिखावै ॥१॥*
*भरम कर्म मोह नहिं ममता, वाद विवाद न जानूं ।*
*मोहन सौं मेरी बन आई, रसना सोई बखानूं ॥२॥*
*निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै ।*
*निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ॥३॥*
.
जब मुझे निश्चल परब्रह्म परमात्मा का अभेद ज्ञान प्राप्त हुआ तभी से काम क्रोध विकार मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकते । किन्तु मैं परम सुखी हूँ । शोक संताप आदि दोष मेरे से दूर ही खड़े रहते हैं । मेरे पास नहीं आते राग द्वेष मद मात्सर्यमोह आदि चित्त के दोष जो ज्ञान के प्रतिबन्धक माने जाते हैं, वे पता नहीं कहां भाग गये ।
.
जाग्रत् अवस्था में ब्रह्माकारवृत्ति से जिस ब्रह्म को देखता हूँ उसी का स्वप्न में मुझे भान होता है । कृतकृत्य होने से मेरे लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं है । जिसको जानना था वह जाना गया अतः मेरे लिये कोई ज्ञातव्य शेष नहीं है । मोह ममता रूपी हिरण्यकशिपु महादैत्य को आत्मसाक्षात्कार रूपी नृसिंह देव ने नष्ट कर डाला ।
.
शुद्ध बोध स्वरूप होने से वाद विवाद तो कभी याद ही नहीं आते । विश्व को मोहित करने वाले मोहन भगवान् में मेरा बहुत प्रेम हो रहा है । मैं अपनी वाणी से उसी का यशोगान करता हूँ और उसी का नाम स्मरण करता हूँ । मेरे हृदय में तो विशेष रूप से भगवान् ही विराज रहे हैं । मेरा मन उन्हीं के चरणों में संतुष्ट हो रहा है । अहो मैं उस परमानन्द को हाथ में रखे हुए आवलां की तरह प्रत्यक्ष जान कर कृतकृत्य हो गया हूँ । मैं केवल शुद्ध बोधरूप से स्फुरित हो रहा हूँ ।
.
योगवासिष्ठ में लिखा है कि –
हे वत्स राम ! जैसे सरोवर में गिरे हुए पत्ते, जल, मल(काई आदि) और काष्ठ यद्यपि परस्पर संबद्ध रहते हैं तथापि भीतरी संग से(आसक्ति) से रहित होने का कारण वे कभी दुःखी ही नहीं होते । उसी तरह यद्यपि आत्मा देह इन्द्रियें और मन, परस्पर पूर्णतया संबद्ध है तथापि अन्तःकरण में आसक्ति का अभाव होने से ज्ञानी महात्मा सदा सर्वदा दुःख रहित ही रहता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें