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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*पशुवां की नांई भर भर खाइ, व्याधि घणेरी बधती जाइ ।*
*पशुवां नांई करै अहार, दादू बाढै रोग अपार ॥*
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इहिं औषद तैं साध सब, अनत उधारी देह ।
कोइ कुपछ का फेर है, नहीं त औषद ऐह ॥३॥
बषनां से किसी ने प्रश्न किया कि आपने भवबाधा काटने की जो औषधि बताई है, उसे ही औषधि क्यों मानी जाए । भगवत्प्राप्ति के तो और भी अनेक मार्ग हैं । इस पर बषनांजी कहते हैं, इस रामनाम-स्मरण रूपी औषधि से समस्त साधु संतों के साथ-साथ अनंत भक्तों ने अपने मनुष्य-जन्म का उद्धार = मोक्ष प्राप्त किया है । यदि किसी को रामनाम का अवलंबन लेने के उपरांत भी भगवत्प्राप्ति नहीं हुई है तो इसमें रामनाम की कमी न होकर रामनाम जप करने की कुपछ = कुपथ्य = प्रक्रिया का ही दोष है । अन्यथा कलियुग में भवबाधा काटने का इससे व्यतिरिक्त और दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है ॥३॥
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*संजम सुमिरण कौ अंग ॥*
सत जत साच खिमा दया, भाव भगति पछ लेह ।
तौं अमर औषदी गुण करै, बषनां उधरै देह ॥४॥
सत = सत्त्व = अन्तःकरण = माँ, बुद्धि, चित्त और अहंकार का निग्रह ; जत = इन्द्रिय-निग्रह; साच = सत्य भाषण; खिमा = क्षमाभाव; दया = दयाभाव; भाव = श्रद्धा; भगति = गुरु-रामजी की अनन्य व निष्कामभक्ति के पथ्य के साथ अमर औषधि = रामनाम-जप अपना पूर्ण प्रभाव प्रकट करता है । राम नाम स्मर = प्रभाव से शरीर का उद्धार अर्थात् जीव शिव हो जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

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