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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू निर्विष नाम सौं, तन मन सहजैं होइ ।*
*राम निरोगा करेगा, दूजा नांही कोइ ॥*
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*भजन जड़ी कौ अंग ॥*
अमर जड़ी पानैं पड़ी, सो सूंघी सत जाणि ।
बषनां बिसहर सौं लड़ै, न्यौल जड़ी के पाणि ॥५॥
राम-गुरु-कृपा से जिस भाग्यशाली साधक का, अमरजड़ी = राम-नाम-स्मरण में, पानै पड़ी = चित्त आसक्त हो जाता है, सतजाणि = सत्य जानिये कि रामनाम रूपी जड़ी भवबाधा रूपी रोग को निर्मूल करने के लिये अत्यन्त = सस्ते दामों में = अनायास ही मिल गई है ।
ऐसा साधक इस न्यौलजड़ी = को बस में कर लेने वाली जड़ी बूँटी = राम-नाम-स्मरण के पाणि = बल से आवागमन भयानक बिसहर = साँप से लड़कर उसे अपने वशीभूत कर लेता है और मोक्ष रूपी लक्ष्य प्राप्त कर लेता है ॥५॥
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कीड़ी कुंजर सौं लड़ै, गाइ सिंघ कै संग ।
बषनां भजन प्रताप थैं, निबला सबलौं अंग ॥६॥
कीड़ी = चींटी रूपी सुरति कुंजर = हाथी रूपी अहंकारादि दुष्टवृत्तियों से लड़ती है । गाय रूपी जीवात्मा सिंघ रूपी विषय भोगों से लड़ता है । बषनांजी कहते हैं, ये दोनों ही निर्बल हैं तथापि रामनाम-भजन रूपी सबल = बलशाली का आश्रय पाकर ये अपने शत्रुओं से लड़ती हैं और मोक्ष रूपी विजय हासिल करती हैं । अथवा ये निर्बल भी राम-नाम के प्रभाव से सबल हो जाती है ॥६॥
(क्रमशः)

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