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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू निर्विकार निज नांव ले, जीवन इहै उपाय ।*
*दादू कृत्रिम् काल है, ताके निकट न जाय ॥*
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*बिसास सुमिरण कौ अंग ॥*
जे डँक लागै सरप का, ताथैं लहरि न जाऊँ ।
बिसपालण बषनां कहै, नाराइण कौ नाऊँ ॥७॥
कदाचित् राम-नाम की साधना करने वाले प्रारम्भिक स्थिति के साधक की सांसारिक माया मोह रूपी सर्प के डंक प्रभावित = आकर्षित करते भी हैं तो *उसके पास उस आकर्षण को समाप्त करने के लिये रामजी का नाम सर्वदा उपलब्ध रहता है । जिससे लहरि = राम के प्रति एकान्तिक निष्ठा समाप्त नहीं* है क्योंकि सारी विघ्न बाधाओं को शमित करने की सामर्थ्य राम नाम में है । यहाँ सर्प संसार का, सर्प का डंक = संसार के प्रति आकर्षण का प्रतीक है । लहरि = प्रभाव । बिसपालण = विष के प्रभाव को समाप्त करने वाला । नाऊं = नाम ॥७॥
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*अखण्ड सुमिरण कौ अंग ॥ कुंडलिया छंद ॥*
बषनां बहुतेरी करौ हरि सुमिरण की प्यास ।
राम नाम जपिबौ करौ छह रुति बारह मास ॥
छह रुति बारह मास देखि अैसी बिधि कीजै ।
माया तैं मन टालि नांव गोब्यंद का लीजै ॥
बिन लीयाँ न पावस्यौ बात जे करौ अनेरी ।
हरि सुमिरण की प्यास करौ बषनां बहुतेरी ॥८॥
बषनां जी कहते हैं, राम नाम स्मरण करने की प्यास = अभिलाषा प्रभूत मात्रा में करनी चाहिये । रामनाम का जप छहों ऋतुओं और बारहों मासों में अहर्निश करना चाहिये । रामनाम का जप अखण्ड तैलधारावत् पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास के साथ करना चाहिये । वस्तुतः राम नाम जप करने की विधि यही है । साथ ही मन में से माया एवं तज्जन्य संसार का आकर्षण सर्वथा हटाकर गोविन्द = रामजी के नाम का स्मरण करना चहिये । बिना राम नाम जप के रामजी की प्राप्ति सर्वथा असंभव है । अनेरी = अन्य साधनों से रामजी की प्राप्ति दुष्कर ही है । दादूजी महाराज ने कहा है...
“रात दिवस का रोवणा, पहर पलक का नाहिं ।
रोवत रोवत मिल गये, दादू साहिब माहिं ॥”
यहाँ रोवणा = रोना राम-नाम स्मरण के लिये आया है ॥८॥
(क्रमशः)

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