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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी. @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३६. निंदा कौ अंग ४/६*
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जिनकी रसनां रस८ नहीं, सबद सुद्ध९ नहीं नांम ।
कहि जगजीवन रांमजी, ते प्रांणी किहिं कांम ॥४॥
(८. रसनां रस=वाणी में मिठास) {९. सुद्ध=शुद्ध(निन्दा आदि से रहित)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनकी जिह्वा स्नेह युक्त वाणी नहीं कहती जो शुद्धता से राम नाम नहीं सिमरते संत कहते हैं कि वे प्राणी किसी प्रयोजन के नहीं हैं, उनका जीवन व्यर्थ है ।
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साह१० सुबुद्धि रांम चित, बोलै बचन बिचार ।
पातिसह रीझत भयौ, पहरायौ तिहि बार ॥५॥
(१०. साह=साधु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो साधु जन हैं , बुद्धिमान हैं उनके मानस में राम रहते हैं । और वो बात विचार कर करते हैं । उससे प्रभु भी प्रसन्न रहते हैं । और उन्हें बिना देर किये पार करते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, दुसमन दाधी देइ ।
क्रितघ्नी११ कपटी जीव के, अंत पड़ी मुख खेह१२ ॥६॥
{११. क्रितघ्नी=कृतघ्न(उपकार न मानने वाला)} (१२. खेह=धूल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु कृतघ्न व कपटी जीव शत्रु की भांति दग्ध करते हैं । ऐसे जीवों के तो अंत समय मुख पर राख पड़ती है ।
(क्रमशः)

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