🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#बखनांवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू राम नाम निज औषधि, काटै कोटि विकार ।*
*विषम व्याधि थैं ऊबरै, काया कंचन सार ॥*
========
*सुमिरण उपदेस कौ अंग ॥*
राम नाम निज औषदी, सतगुरि दई बताइ ।
औषदि खाइ र पछि रहै, तौ बषनां बेदन जाइ ॥१॥
संसार रूपी बंधन को काट फैंकने के लिये सद्गुरु महाराज ने राम-नाम-स्मरण रूपी रामबाण(अनुभूत) औषधि बता दी है । यदि कोई आत्मजिज्ञासु साधक इस औषधि का(पछि-पथ्य-परहेज) विधि-विधान से सेवन करे तो बषनांजी कहते हैं ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं’ रूपी वेदना = दुःख का समूल नाश हो जाता है ॥१॥
.
*साच उपदेस सुमिरण कौ अंग ॥*
पछि प्राणी राखै नहीं, जो भावै सो खाइ ।
तौ औषद गुण ना करै, बसननां व्याधि न जाइ ॥२॥
यदि प्राणी = रोगी = आत्मजिज्ञासु औषधि सेवन करते समय वैद्य = गुरु के बताये अनुसार पथ्य = साधना का आश्रय नहीं लेता, अपितु मन के अनुसार जो जी में आये उसी में अनुसार खाता-पीता = व्यवहार = साधना करता है, तो औषद = रामनाम-स्मरण तनिक भी लाभ प्रदान नहीं करता, तथा ब्याधि = जन्म-मरण का चक्र यथारूप रह जाता है । इसमें औषधि का दोष नहीं, औषधि सेवन करने वाले का दोष है । दादूजी ने कहा ~
“औषध खाय न पथ रहै, विषम ब्याधि क्यौं जाइ ।
दादू रोगी बावरा, दोष बैद कौ लाइ ॥२॥”
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें