बुधवार, 21 जून 2023

गोपालजी भट्ट की पद्य टीका

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*मन मतवाला मधु पीवै, पीवै बारम्बारो रे ।*
*हरि रस रातो राम के, सदा रहै इकतारो रे ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ५९)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*१. गोपालजी भट्ट की पद्य टीका
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*इन्दव-*
*भट्ट गुपाल बसें उन लाल लसें,*
*प्रिय-पीवरे विख्यात स्वरूपा ।*
*भोग धरै अरु राग करें,*
*अनुराग पगे जग बात अनूपा ॥*
*स्वाद लियो वन माधुरता जिन,*
*सीत चख्यो सु भये रस रूपा ।*
*औगुन त्यागत जीवन के गुन,*
*लेत भले जन में बड़ भूपा ॥३४६॥*
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गोस्वामी गोपाल भट्ट जी श्रृंगारमाधुर्य और धामनिष्ठा में निपुण, गौड़ ब्राह्मण महात्मा श्रीव्यङ्कट भट्टजी के पुत्र और महाप्रभु कृष्ण चैतन्य जी के शिष्य थे । आपके हृदय में प्रिय प्रभु सदा बसते हुए राधाकृष्ण के स्वरूप में प्रकट रूप से शोभा देते थे ।
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आप भगवान् के आगे नाना प्रकार के भोग धर कर अति अनुराग से जीमने की प्रार्थना करते थे तथा नाना रागों द्वारा प्रभु के गुणगान करते कराते थे । प्रभु प्रेम में निमग्न रहते थे, आपकी यह अनुपम बात जगत में विख्यात थी ।
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आपने वृन्दावन की माधुरी का स्वाद अच्छी प्रकार लिया था । जिनने आप का सीत(उच्छिष्ट) प्रसाद पाया था, वे रस(भगवत) रूप ही हो गये थे ।
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आप जीवों के अवगुणों को त्यागकर अच्छी प्रकार गुण ही ग्रहण करते थे । सब ऐश्वर्य को त्याग कर वृन्दावन में आ बसे थे । आप भक्तों में राजा के समान महान् हुये हैं ।
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२. भूभृति - नाम नाभाजी ने इन भक्तों की नामावलि में नहीं दिया है । लोकनाथ दिया है और चतुरदास जी ने उक्त नामावलि में लोकनाथ नाम नहीं होने पर भी ३४९ के पद्य में लोकनाथजी की टीका दी है । इससे सूचित होता है कि लोकनाथ जी का ही दूसरा नाम भूभृति हो वा भूभृतिभिन्न ही हों । इसका निर्णय करने का साधन अभी प्राप्त नहीं है ।

३. थानेश्वरी जगन्नाथजी महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य जी के पार्षद थे । प्रथम अपने घर में ही, पूर्व जन्म के संस्कार और हरिकृपा से प्राणनाथ भगवान् का प्रकाशमय रूप तीन दिन तक देखा था । उससे आपको अति आनन्द की प्राप्ति हुई थी । फिर आप महाप्रभुजी के शिष्य हो गये थे । महाप्रभु जी ने इनका नाम "कृष्ण दास" रखा था । सब लोग आपको आदरपूर्वक 'कृष्णजी' ही कहते थे । 
एक दिन स्वप्न में 'श्रीमनमोहनजी' ने कहा- "हम अमुक कूप में हैं, निकालकर प्रतिष्ठा कराओ और सेवा करो ।" आपने अति प्रेम से वैसा ही किया था । आपके पुत्र रघुनाथदास विद्याहीन थे । एक समय आप इसी चिन्ता में निमग्न हो रहे थे । तब स्वप्न में दयानिधि भगवान् ने एक श्लोक बताकर कहा - "यही श्लोक पुत्र को पढ़ा दो ।" आपने वह श्लोक पुत्र को पढ़ा दिया । उसके बाद आपके पुत्र रघुनाथदास अच्छे विद्वान् और हरिप्रेमी हो गये थे ।
(क्रमशः)

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