रविवार, 2 जुलाई 2023

*चिंतावणी सुमिरण कौ अंग*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू अगम वस्तु पानैं पड़ी, राखि मंझि छिपाइ ।*
*छिन छिन सोई संभालिए, मत वै बीसर जाइ ॥*
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*चिंतावणी सुमिरण कौ अंग*
पहली था सो अब नहीं, अब सो पछै न थाइ ।
हरि भजि बिलब न कीजिये, बषनां बारौ जाइ ॥९॥
बषनांजी जीव को चेताते हुए रामभजन करने का सत्परामर्श देते हैं । हे जीव ! तू जैसा पहले था, वैसे अब नहीं है और जैसा अब है वैसा आगे नहीं रहेगा । रामनाम-स्मरण करने में तनिक भी विलम्ब मत कर क्योंकि बारौ = बार = समय प्रतिपल व्यतीत हो रहा है ॥९॥ दादूजी ने कहा है...
“बार बार यहु तन नहीं, नर नारायण देह ।
दादू बहुरि न पाइये, जनम अमोलिक येह ॥”
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*बिना भजन बाणी तृस्कार कौ अंग ॥*
जे बोल्या तो राम कहि, जे चुपका तौ राम ।
मन मनसा हिरदा महीं, बषनां यहु विश्राम ॥१०॥
बषनांजी रामनाम स्मरण का प्रकार बता रहे हैं, यदि बोलना पड़े तब भी राम राम ही बोलिये । यदि चुप रहने का अवसर आये तब भी राम नाम का स्मरण करिये । मन से, मन की वृत्ति से और हृदय से रामनाम का कीजिये क्योंकि इनको विश्राम राम नाम से ही मिलता है । मन, मनसा हैं । भोगों की दौड़ते हैं । अतः इनको शान्त करने का उपाय इन्हें राम नाम संयुक्त कर देना ही है ॥१०॥ “मन बस करण करने का उपाय नाम बिना नाहीं ॥” (श्रीरामचरण वाणी)
(क्रमशः)

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