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*दादू सतगुरु कहै सो कीजिये, जे तूं सिष सुजाण ।*
*जहाँ लाया तहँ लागि रहु, बुझे कहा अजाण ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*संतन सेवन गांव दियो किन,*
*भूपति दुष्ट उतार लियो है ।*
*श्याम हि नन्द विचार करयो जब,*
*दास मुरारि हिं पत्र दियो है ॥*
*जा विधि होय सुता विधि आवहु,*
*आवत वेगि अचैं१ न लियो है ।*
*पृष्ठ करी सु प्रणाम निवेदन,*
*भोजन मैं चलि प्रेम भयो है ॥३५८॥*
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आपके गुरु स्थान को पहले किसी राजा ने संतों की सेवा के लिये एक ग्राम दिया था, आपके गुरु श्रीश्यामानन्द जी के समय में वहाँ का राजा दुष्ट स्वभाव का था, उसने वह ग्राम स्थान से छीन लिया ।
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जब श्यामानन्द जी को ज्ञात हुआ तब कुछ विचार करके श्यामानन्द जी ने अपने शिष्य रसिक मुरारिदास जी को पत्र दिया ...
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कि "तुम जिस स्थिति में हो, उसी स्थिति में पत्र देखते ही यहाँ चले आओ ।" पत्र मिला तब आप भोज कर रहे थे । पत्र पढ़ते ही उठकर चल दिये । आपके श्यामानन्दजी सत्रह कोस दूर थे किन्तु आप बिना आचमन१ किये जूठे हाथ मुख ही सत्रह कोस का मार्ग पूरा कर ...
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श्यामानन्दजी की पीठ की ओर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके फिर हाथ जोड़ कर निवेदन किया कि- "पत्र मिला तब मैं भोजन कर रहा था, आपकी आज्ञा के अनुसार मैं उसी स्थिति में चला आया हूँ, आचमन भी नहीं किया है ।" यह सुनकर श्यामानन्द जी का हृदय प्रेम में निमग्न हो गया था ।
(क्रमशः)

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