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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३८. सज्जन दुरजन कौ अंग ८/१०*
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कहि जगजीवन सुकरमी११, जीव सुबुद्धी१२ नांम ।
रोम रोम हरि एक रस, ह्रिदै बिराजै रांम ॥८॥
(११. सुकरमी=सत् कर्म करने वाले) (१२. सुबुद्धी=सद्बुद्धि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सुकर्मी जीव सदा सुबुद्धि ही अपनाते हैं जिनकी रोमावलि तो राम राम रटती है और जिनके ह्रदय में राम विराजते हैं ।
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मूरख के संग बैठतां, मांन गमावै मांम१३ ।
कहि जगजीवन प्रभुता महिमा, आदर नासै नांम ॥९॥
{१३. मांम=ममता(अपनापन)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूर्खजन के संग करने से अपनापन, प्रभुता, मान आदर यश सब नष्ट होते हैं ।
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रांम बिमुख नर उभै की, माया१ ऊपरि मूंठि२ ।
कहि जगजीवन ज्वाला यों ही, जस आदौ३ तस सूंठि ॥१०॥
(१. माया=जादू) (२. मूंठि=मन्त्रसिद्ध शस्त्र का प्रक्षेपण)
(३. आदौ=प्रातःकाल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम विमुख पुरुष का जोर माया ही है जिसे वह सोचता है कि इसके प्रभाव से मैं सबको मोह सकूंगा । ये मेरे लिये मंत्र सिद्ध शस्त्र है जो चल जायेगा किंतु अज्ञान रात्रि के अंधकार के बाद ज्ञान रुपी प्रभात में यह गुणहीन हो जाता है ।
इति सज्जन दुरजन कौ अंग संपूर्ण ॥३८॥
(क्रमशः)

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