रविवार, 23 जुलाई 2023

उस बहुरूपिये के अनेक रंग हैं

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*दादू मैं नाहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ ।*
*मैं तैं पड़दा मिट गया, तब ज्यूं था त्यूं ही होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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“एक आदमी जंगल गया था । उसने देखा, पेड़ पर एक बहुत सुन्दर जीव बैठा है । उसने एक आदमी से आकर कहा, 'भाई, अमुक पेड़ पर मैंने एक लाल रंग का जीव देखा है ।' उस आदमी ने कहा, 'मैंने भी देखा है । पर वह लाल क्यों होने लगा ? वह तो हरा है ।” तीसरे ने कहा, ‘नहीं जी, वह हरा नहीं, पीला है ।’
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अन्त में लड़ाई ठन गयी । तब उन लोगों ने पेड़ के नीचे जाकर देखा, वहाँ एक आदमी बैठा हुआ था । पूछने पर उसने कहा, 'मैं इसी पेड़ के नीचे रहता हूँ । उस जीव को मैं खूब पहचानता हूँ । तुम लोगों ने जो कुछ कहा सब ठीक है । वह कभी तो लाल होता है, कभी आसमानी, और भी न जाने क्या क्या होता है । फिर कभी देखता हूँ, उसमें कोई रंग नहीं ।’
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“जो आदमी सदा ही ईश्वर-चिन्तन करता है, वही समझ सकता है कि उनका स्वरूप क्या है । वही मनुष्य जानता है कि ईश्वर अनेक रूपों से दर्शन देते हैं । वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी । जो आदमी पेड़ के नीचे रहता है, वही जानता है कि उस बहुरूपिये के अनेक रंग हैं और कभी कोई रंग नहीं रहता । दूसरे आदमी तर्क-वितर्क करके केवल कष्ट ही उठाते हैं ।
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“वे साकार हैं और निराकार भी । यह किस प्रकार है, जानते हो ? जैसे सच्चिदानन्द एक समुद्र हों, जिसका कहीं ओर छोर नहीं । भक्ति की हिम-शक्ति से उस समुद्र का पानी जगह जगह जमकर बर्फ बन गया हो, - मानो पानी बर्फ के आकार में बँधा हुआ हो; अर्थात् भक्त के पास वे कभी कभी साकार रूप में दर्शन देते हैं । ज्ञान-सूर्य के उगने पर वह बर्फ गलकर फिर पानी हो जाता है !”
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डाक्टर - सूर्य के उगने पर बर्फ गलकर पानी हो जाता है; और आप जानते हैं - बाद में सूर्य की उष्णता से पानी निराकार बाष्प बन जाता है ?
श्रीरामकृष्ण - अर्थात् 'ब्रह्म सत्य है और संसार मिथ्या' इस विचार के बाद समाधि के होने पर रूप आदि कुछ नहीं रह जाते । तब फिर ईश्वर के सम्बन्ध में किसी को यह नहीं मालूम होता कि वे व्यक्ति हैं अथवा अन्य कुछ । वे क्या हैं, यह मुख से नहीं कहा जा सकता ।
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कहे भी कौन ? जो कहेंगे, वे ही नहीं रह गये ! वे अपने 'मैं' को फिर खोजकर भी नहीं पाते ! उनके लिए ब्रह्म निर्गुण है । तब केवल बोध रूप में ब्रह्म का बोध होता है । मन और बुद्धि के द्वारा कोई उसे पकड़ नहीं सकता ।
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“इसीलिए कहते हैं, भक्ति चन्द्र है और ज्ञान सूर्य । मैंने सुना है, बिलकुल उत्तर में और दक्षिण में समुद्र हैं । वहाँ इतनी ठण्डक है कि पानी पर बर्फ की चट्टानें बन जाती हैं । जहाज नहीं चलते । वहाँ जाकर अटक जाते हैं ।”
डाक्टर - भक्ति के मार्ग में आदमी अटक जाते हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - हाँ, ऐसा होता तो है, परन्तु इससे हानि नहीं होती । उस सच्चिदानन्द-सागर का पानी ही बर्फ के आकार में जमा हुआ है । यदि और भी विचार करना चाहो, यदि 'ब्रह्म सत्य है और संसार मिथ्या' यह विचार करना चाहो तो इसमें भी कोई हानि नहीं है । ज्ञानसूर्य से वह बर्फ गल जायेगा, और वह गलकर भी उसी सच्चिदानन्द-सागर में रहेगा ।
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"ज्ञान- विचार के बाद समाधि के होने पर 'मैं' 'मेरा' यह कुछ नहीं रह जाता । परन्तु समाधि का होना बहुत मुश्किल है । 'मैं' किसी तरह जाना नहीं चाहता । और जाना नहीं चाहता, इसीलिए फिर-फिरकर इस संसार में उसे आना पड़ता है ।
(क्रमशः)

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