सोमवार, 10 जुलाई 2023

*मानसी विरह का अंग ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू शब्द अनाहद हम सुन्या,*
*नखसिख सकल शरीर ।*
*सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥*
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*मानसी विरह का अंग ॥*
सुणिजै ऊंडौ गाजतौ, सिखराँ बीचि खिवाहिं ।
बषनां बादल बिरह का, बरसि बरसि भरि जाहिं ॥१॥
बषनां कहते हैं, विरह रूपी बादल गहरी ध्वनि करता हुआ सुना जाता है । वह सिखरां = सर्वोच्च स्थान पर = आकाश में खिवाहिं = चमकता है और वर्षा कर-करके ही भरि जाहि = संतुष्ट होता है । यहाँ विरह बादल स्वरूप है । उसकी गहरी गर्जना ही विरह की गंभीर वेदना है ।
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जब साधक को परमात्मा मिलता नहीं, तब अमिलन जन्य वेदना साधक में उपजती है । जितनी गहराई इस वेदना की बढती जाती है उतनी ही परमात्म-प्राप्ति की दूरी कम होती जाती है । यह विरह शिखर = सहस्त्रारचक्र तक में जाकर चमकती है । अथवा इस विरह के कारण ही सहस्त्रार में शब्द का प्रकाश होता है ।
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पाठक यहाँ ध्यान रखें, निर्गुणियाँ संतों ने अपने इष्ट को शब्द स्वरूपी माना है जिसका साक्षात्कार सहस्त्रार में अनहदनाद तथा परमप्रकाश के रूप में ही होता है । विरह तब तक बढ़ता रहता है जब तक परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता । यही विरह रूपी बादलों का वर्षा करते-करते संतुष्ट न होना है ।
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जब आत्मसाक्षात्कार हो जाता है तब विरह संतुष्ट होकर चिरशांत हो जाता है । पाठक यहाँ ध्यान रखें सगुण-साकारोपासना में ही इष्ट के मिलने के उपरान्त भी उसका वियोग होता है और विरह का क्रम चलता रहता है किन्तु निर्गुणोपासना में ऐसा नहीं है क्योंकि इसमें साधक को स्वात्मतत्त्व का ही बोध होता है जो सदैव उसके पास ही रहता है ।
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स्वात्मतत्त्व न कहीं से आता है और न कहीं जाता है । वह तो सर्वकाल में साधक को प्राप्त ही है किन्तु अज्ञानावरण के कारण साधक उसका अनुभव नहीं कर पाता । जब विरह रूपी अग्नि से जो रामनाम स्मरण रूपी लकड़ी के जलने से उत्पन्न होती है, अज्ञान का अवरण जल जाता है तब स्वात्मतत्त्व का बोध (प्राप्ति नहीं क्योंकि प्राप्ति तो अप्राप्त की होती है और आत्मा कभी भी अप्राप्त नहीं) हो जाता है यही विरह का शान्त होना है ॥१॥
(क्रमशः)

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