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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५२)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३५२. (सिंधी) निज स्थान निर्णय उपदेशा । एकताल*
*अर्श इलाही रब्बदा, इथांई रहमान वे ।*
*मक्का बीचि मुसाफरीला, मदीना मुलतान वे ॥टेक॥*
*नबी नाल पैगम्बरे, पीरों हंदा थान वे ।*
*जन तहुँ ले हिकसा ला, इथां बहिश्त मुकाम वे ॥१॥*
*इथां आब जमजमा, इथांई सुबहान वे ।*
*तख्त रबानी कंगुरेला, इथांई सुलतान वे ॥२॥*
*सब इथां अंदर आव वे, इथांई ईमान वे ।*
*दादू आप वंजाइ बेला, इथांई आसान वे ॥३॥*
इस भजन में श्रीदादूजी महाराज ने इसी शरीर में संपूर्ण तीर्थ तथा ब्रह्म की स्थिति है यह बतला रहे हैं ।
जगत् की पालना करने वाले दयालु परमात्मा का निवास स्थान इसी शरीर में सहस्त्रार चक्र में हैं । क्योंकि वह परमात्मा वहीँ पर मिलता है ।
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यात्रियों के लिये मक्का मदीना सुलतान आदि तीर्थस्थान तथा ईश्वर के दूत पीर पैग़म्बर आदि के स्थान भी इसी शरीर के मध्य में नाभिकमल हृदयकमल या त्रिकुटि के मध्य में है ।
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हे निजाम ! तू अपने हृदय को ही मक्का मदीना आदि तीर्थ समझ कर अन्तर्मुखवृत्ति के द्वारा यात्रा करते हुए अन्दर रहने वाले प्रभु को भज । तुझे वहीँ पर मुल्तान मदीना आदि तीर्थों के दर्शन हो जायेंगे । वहीँ पर दयालु परमात्मा निवास करता है । उसकी उपासना करने वाले नवी पैग़म्बर पीर आदि भी भगवान् के साथ रहते हैं ।
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हे जन ! सांसारिक विषयों से अपने अन्तःकरण को प्रत्याहार के द्वारा हटाकर अन्तर्मुखवृत्ति के द्वारा ब्रह्माकार बनावो । इस शुद्ध हृदय को ही स्वर्ग समझो । तेरे अन्तःकरण में ही जमजमारूप पवित्र नामस्मरणरूप कूप जल है उसमें स्नान कर ।
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इस विषय में प्राचीन कथा प्रसिद्ध है कि मुहम्मद से अट्ठारवी सदी में असमाइल के जन्म के समय में एक नन्हें से शिशु ने अपनी माता के प्यास को शान्त करने के लिये अपनी एडी से पृथ्वी को रगड़कर जल निकाल दिया था उसको अरब देश में स्थित मक्का नगर के कावे में जमजमा नाम का इस्लामियों का तीर्थ कूप है ।
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इसी शरीर में सुबहान(अतिसुन्दर) परमात्मा का दर्शन होता है । इसी शरीर के भीतर कंगुरेला = चित्रविचित्र कोरणी किया हुआ अन्तःकरण ही तख्ता है । उस पर सुलतानरूपी रब्ब(परमात्मा) निवास करता है । सब कुछ इसी शरीर में है । क्योंकि जो ब्रह्माण्ड में है वह सब कुछ पिण्ड में भी हैं ऐसा सिद्धांत है । अतः अपन पिण्ड में ही परमात्मा को भजो ।
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साधनदशा के इसी शरीर के मध्य(वंजाई) पवित्र यात्रा कर । ऐसे करने से तुझे अन्तःकरण में ही परमात्मा प्राप्त हो जायेगा । इस भजन के द्वारा तीर्थों में जाते हुए निजाम को श्रीदादूजी महाराज ने उपदेश दिया था । तभी से वह उनका शिष्य बन गया था ।
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वेदान्तसंदर्भ में ब्रह्मचिन्तन प्रकरण में लिखा है कि –
प्रत्येक प्राणों के हृदय में श्वास के साथ सोऽहं या हंस ऐसा प्रणव का जप होता रहता है । जो इस जप को जान जाता है ऐसा जप करता है तो वह सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है ।
यह देह ही देवालय है इसमें निरंजन देवता देहीरूप से निवास करते हैं । अपनी अनुभूति से पूजित होने पर उसका प्रत्यक्ष होता है ।
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इस हृदयकमल के मध्य में दीपक की तरह प्रकाशमान ओंकार रूप जिसको कोई तर्क से जान नहीं सकता योगियों के ध्यान के योग्य सर्वभूतों में स्थित हरिगुरु शिवस्वरूप वेदोंका साररूप ब्रह्म है । उस को एक बार भी अपने मन से जो चिन्तन कर लेता है तो वह मुक्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

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