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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग २१/२४*
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कहि जगजीवन रांमजी, तन मंहि बरतै तात ।
राजा बचन उदास हरि, दिवस दुःखी सुख रात ॥२१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस देह में प्रभु पिता रहते हैं जिनके वचन अज्ञान अंधकार को दूर करनेवाले हैं वे प्रकाश रुपी दिवस में दुखी व अंधकार रुपी रात्रि में सुखी रहते हैं ।
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बाइस हंस समीप रहैं, मान सरोवर वास ।
अंति दिखायो आप गुन, सु कहि जगजीवनदास ॥२२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सज्जन व दुर्जन हंस व कौवे की भांति इस संसार रुपी मान सरोवर में रहते हैं किंतु स्वभाव वश वे अंत में अपना हंस सद्गुण व कौवा दुर्गुण दिखा ही देता है ।
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अंग बिहूंणा८ संग बिहूणां, सबद बिहूंणा साज ।
कहि जगजीवन रांम भगति बिन, आवै वो किहिं काज ॥२३॥
(८. बिहूंणा=रहित)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ भी साज अंग के बिना चले कैसे संग के बिना चलाये कौन शब्द के बिना बजे क्या ? ऐसे ही भक्ति के बिना जीव किस काम का है वह व्यर्थ है ।
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अरथ बिहूंणा आदमी, तिनकी कैसे आस ।
रांम बिमुख बंबूल नर, सु कहि जगजीवनदास ॥२४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीवन का अर्थ भक्ति ही है उसके बिना जीव किस काम का है, उससे कोइ आशा नहीं करनी चाहिये । वह राम विमुख नर बबूल वृक्ष सा पीड़ादायक है । जो तीक्ष्ण कांटो से भरा रहता है व सम्पर्क में आनेवालों को पीडा पहुँचाता है ।
(क्रमशः)

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