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*दादू हरि रस पीवतां, रती विलम्ब न लाइ ।*
*बारम्बार संभालिये, मति वै बीसरि जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७६ । त्रिताल
अरे मन भजरे आतम राम,
कारज यही करो मन मेरे, इहिं अवसर इहिं धाम ॥टेक॥
मानुष जन्म मान मन मांही, कहो निरंजन नाम ।
पंचों गुण पंचों दिशि रमि हैं, करि लिजे निज काम ॥१॥
ऐसे समझि तजो मन मूरख, गृह दारा धन धाम ।
जन रज्जब जगदीश भजन कर, बीते च्यारों धाम ॥२॥७॥
✦ अरे मन ! आत्मा स्वरूप राम का भजन कर । मेरे मन ! इस मनुष्य शरीर के अवसर में और इस मनुष्य शरीर रूप धाम में यह राम भजन रूप कार्य ही कर ।
✦ इस मनुष्य जन्म में मेरी बात मानकर निरंजन राम का नाम ही बोल । पंच इन्द्रिय रूप पंच गुण पंच विषय रूप पांच दिशा में विचर रहे हैं, उन्हें अपने वश में करके यह भजन रूप अपना काम करले ।
✦ अरे मूर्ख मन ! शरीर की आयु रूप रात्रि के चारों पहर व्यर्थ ही व्यतीत हो गये हैं, अब तो सावधान हो, यह संसार नाशवान है ऐसा समझकर घर की नारी, धन और धाम का राग छोड़कर जगदीश्वर का ही भजन कर ।
(क्रमशः)

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