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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू तो पीव पाइये, कश्मल है सो जाइ ।*
*निर्मल मन कर आरसी, मूरति मांहि लखाइ ॥*
*दादू तो पीव पाइये, भावै प्रीति लगाइ ।*
*हेजैं हरि बुलाइये, मोहन मंदिर आइ ॥*
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*हित सनेह कौ अंग ॥*
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दौं दाधा हरिया हुवा, बध्या सनेहाँ हेत ।
ऊपरि बूठौ राम रस, बषनां निपना खेत ॥२॥
दौं = विरह रूपी अग्नि के ऊपर राम-नाम रूपी स्मरण रूपी, रस = घृत के, बूँदे पड़ने से साधक का हृदय, दाधा = जला = विरह संतप्त हो गया ।
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जैसे ही विरह अपने चरम पर पहुँचा स्वात्मतत्त्व का, हरिया हुवा = साक्षात्कार हो गया । परिणामस्वरूप सनेहां = स्नेहास्पद = स्वात्मतत्त्व से स्नेह सम्बन्ध स्थापित हो गया । अपनत्व का भाव स्थिर हो गया और अंत में निपना खेत = मोक्ष की प्राप्ति हो गई (विदेहमुक्त) ।
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पाठकों की जानकारी के लिये एक तथ्य और बता देना आवश्यक है कि निर्गुणियाँ संतों ने अपनी साधना का क्रम सर्वप्रथम सद्गुरु महाराज से राममंत्रोपदेश प्राप्त करना, फिर उसको अहर्निश तैलधारावत् जपना तत्पश्चात् स्वात्मतत्त्व अमिलन जन्य विरह उत्पन्न करना, इसके पश्चात विरह को प्रेम में परिवर्त्तित करना और अंत में परमात्मा का साक्षात्कार प्राप्त कर लेना बताया है ।
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यहाँ बषनांजी इसी क्रम का अनुसरण कर रहे हैं
“काम्याँ बल्लभ कामणी ज्यूँ दाम्याँ बल्लभ दाम ।
अमल्याँ बल्लभ अमल ज्यूँ यूँ साधाँ बल्लभ राम ॥
यूँ साधाँ बल्लभ राम राम रटि बिरह जगावै ।
बिरह जगावै प्रेम प्रेम परकास करावै ।
परकास परस परमातमा पाय रहै बिसराम ।
काम्याँ बल्लभ कामणी ज्यूँ दाम्याँ बल्लभ राम ॥”
श्रीस्वामी रामचरणों की अनुभववाणी ॥२॥
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दादूजी ने कहा है
“पहली आगम बिरह का, पीछै प्रेम प्रकास ।
प्रेम मगन लै लीन मन, तहां मिलन की आस ॥३/९९॥
(क्रमशः)

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