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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५३)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३५३. (पंजाबी) क्रीड़ा ताल खंडनि*
*आसण रमदा रामदा, हरि इथां अविगत आप वे ।*
*काया काशी वंजणां, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥टेक॥*
*महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे ।*
*स्वर्ग सुखासण हुलणैं, हरि इथैं आत्मराम वे ॥१॥*
*अमी सरोवर आतमा, इथांई आधार वे ।*
*अमर थान अविगत रहै, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥२॥*
*सब कुछ इथैं आव वे, इथां परमानन्द वे ।*
*दादू आपा दूर कर, इथांई आनंद वे ॥३॥*
इति राग विलावल समाप्त ॥२१॥पद २०॥
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हे नागर ! सब में रमण करने के कारण राम ही ब्रह्म है । श्रुति में भी कहा है कि जिसमें योगी रमण करते हैं जो नित्य सच्चिदानन्द हैं वही ब्रह्म रामपद का लक्ष्यार्थ है । वही रामरुपी ब्रह्म इस शरीर में अष्टदल वाले इस हृदयकमल में विराजता है । इसी शरीर में सहस्त्रारचक्र ही काशी है जहां शिव विराजते हैं ।
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ध्यानविन्दुपनिषद् में लिखा है कि –
रेचक प्राणायाम करते समय अपने ललाट के मध्य ज्ञानस्वरूप त्रिनेत्रधारी शुद्ध स्फटिकमणि के सदृश गौरवर्ण वाले कलारहित पापनाशक भगवान् शंकर का ध्यान करे । इसी शरीर के मध्य हृदयप्रदेश में हरि की मानसपूजा और जप होता है । महादेव मुनिगण देवता सिद्ध आदि को का विश्राम स्थान भी इसी शरीर के मध्य सहस्त्रारचक्र है । इन्द्रियों का तथा ब्रह्मविचार का स्थान भी शरीर ही है ।
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ध्यानविन्दुपनिषद् में लिखा है कि –
योगमार्ग का ध्यान बतलाती हुई श्रुति कहती है कि – हृदयकमल आठ दल वाला और बत्तीस पंखुडियों वाला है । इसके मध्य में सूर्य टिका हुआ है और सूर्य के मध्य में चन्द्रमा है । चन्द्र के मध्य में अग्नि है और अग्नि के मध्य में प्रकाश है । उस प्रकाश के मध्य में पीठ है ।
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अर्थात् आसन है जो अनेक प्रकार के रत्नों से जगमगा रहा है । उस आसन के मध्य में देव विराजमान हैं । जो परमात्मदेव सभी स्थानों पर माया रहित निरंजन है । श्रीवत्स कौतुभ मणि धारण किये मोती और मणियों की माला धारण किये हुए विभूषित हो रहे हैं । स्वच्छ स्फटिक मणि के समान करोड़ों चन्द्रमा के प्रकाश वाला है । ऐसे महाविष्णु का साधक योगी विनम्र होकर ध्यान करें ।
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तुलसी पुष्प के समान नाभिस्थान में विराजमान चतुर्भुजमहाविष्णु का पूरक प्राणायाम करते हुए साधक योगी को ध्यान करना चाहिये । कुम्भक प्राणायाम करते समय आसन से बैठे हुए तथा चार मुख और रक्तवर्ण वाले ब्रह्मा जी का साधक योगी हृदय में ध्यान करें ।
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रेचक प्राणायाम करते समय ललाट में ज्ञानस्वरूप त्रिनेत्रधारी स्फटिकमणि के समान गौरवर्ण वाले पापों के नाशक शंकर का ध्यान करें । नासिका के मूल से लेकर भ्रकुटी में मध्य ललाट में सच्चिदानन्द ब्रह्म का ध्यान करना चाहिये । त्रिविध ताप और पाप का नाशक जो हरि का ध्यान है उससे प्राप्त होने वाला आनन्द ही इस शरीर में सुखासन है ।
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सबका आधारभूत अमृत सरोवर आत्मा भी इसमें प्राप्त होता है । वह समाधि स्थान भी इसी शरीर में है । कहने का भाव यह है कि जो ब्रह्माण्ड में है वह सब इस पिण्ड में भी है । यहां ही परमात्मा प्राप्त होता है । हे नागर ! तू अहंकार को त्यागकर अन्तर्मुख वृत्ति द्वारा हरि को देखेगा तब तू अवश्य उसको पायेगा ।
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ब्रह्मविद्योपनिषद् में –
ब्रह्मा का हृदय स्थान है । विष्णु का कंठ में तालु के मध्य में रुद्र स्थित है और मस्तक में महेश्वर स्थित है ।
इति श्रीमदात्मारामकृतभावार्थदिपिकायां भाषानुवादे रागविलावल समाप्त ॥२१॥
(क्रमशः)

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