सोमवार, 10 जुलाई 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १७०*

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*तिल तिल देखूं साहिब मेरा, त्यों त्यों आनन्द अंग न मावे रे ।*
*दादू ऊपर दया मया करि, कब नैनहुँ नैन मिलावे रे ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १२२)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७० प्रभु मिलन । त्रिताल
जब राम सनेही आव हीं,
तन मन मंगल होय परम सुख, आनन्द अंग में मावहीं ॥टेक॥
अधिक उच्छाह मुदित मन मेरे, चहुं दिशि चौक पुरावहीं ।
वलि वलि जाउं अघाउं१ न कब हूं, प्रेम मगन गुण गावहीं ॥१॥
सकल सुहाग भाग सुन्दरि के, मोहन रूप दिखावहिं ।
जन रज्जब जगदीश दया करि, परदा खोलि खिलाव हिं ॥२॥१॥
प्रभु के मिलन से होने वाले सुख को बता रहे हैं -
✦ जब मेरे प्यारे राम आयेंगे, तब मेरे शरीर में पूर्ण मंगल हो जायेगा और मन में परम सुख होगा, वह आनन्द मेरे अंग में नहीं समा सकेगा ।
✦ मेरे मन में अत्यधिक उत्साह होगा, मैं प्रसन्न होकर चारों ओर चौक पुराऊंगी । बारंबार बलिहारी जाऊंगी । कभी भी तृप्त१ नहीं हूँगी । जब विश्व मोहन प्रभु अपना रूप दिखायेंगे ।
✦ तब मुझ साधक सुन्दरी का सब प्रकार से भाग्योदय होकर सौभाग्य प्राप्त होगा । फिर तो वे जगदीश्वर दया करके अज्ञान का परदा हटा देंगे और मुझे अपने साथ खिलाया करेंगे ।
(क्रमशः)

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