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*दादू मैं दासी तिहिं दास की,*
*जिहिं संगि खेलै पीव ।*
*बहुत भाँति कर वारणें, तापर दीजे जीव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*रसिक मुरारिजी*
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*इन्दव-*
*संतन सेव विचार करै विधि,*
*पार न पावत कौन मुरारी ।*
*साधन के चरणामृत के घर,*
*माट भरे रहि पूजन धारी ॥*
*आवत दास तिनैं सुख दे अति,*
*जीभ कहै न सके सुविचारी ।*
*उत्सव यूं गुरु को सु करै दिन,*
*मान रु द्वादश राखत ज्यारी ॥३५४॥*
रसिक मुरारि जी संतों की सेवा विचारपूर्वक करते थे । उनकी सेवा विधि का पार कौन पा सकता है ? आपके घर पर संतों के चरणामृत के मटके भरे हुए रखे रहते थे । आप प्रेम पूर्वक उन्हीं को प्रणाम करते थे और हृदय में भाव धारण कर के उन की पूजा करते थे ।
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आपके यहाँ भगवत भक्त आते थे उनको अति सुख दिया करते थे । आपकी अनुपम प्रीति की रीति को जिह्वा कह नहीं सकती और बुद्धि भी विचार करके थक जाती है । आप गुरुजी का वार्षिक उत्सव इस प्रकार करते थे कि १२ दिन तक संतों को रखकर सन्मान पूर्वक भोजन जिमाते थे ॥
(क्रमशः)

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