शनिवार, 15 जुलाई 2023

*३७. निगुणां कौ अंग २९/३२*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग २९/३२*
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गुणवन्त बूझै रांम गुन, रांम भगति पिव प्यास ।
हरिक्रित भावै हेत हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥२९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि गुणीजन रामगुण ही पूछते कहते हैं । उन्हें राम भक्ति की ही प्यास बनी रहती है । उन्हें प्रभु का यश व संकीर्तन ही सुहाता है ।
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रांम न सुमरैं दोजगी, महा मूरख मतिभ्रिष्ट४ ।
कहि जगजीवन नवै न निज घर, ताथैं कहिये नष्ट ॥३०॥
(४. मतिभ्रष्ट=कुबुद्धि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नर्कगामी जीव राम सिमरण नहीं करते वे मति भ्रष्ट महा मूर्ख हैं । वे प्रभु मन्दिर में प्रणामं नहीं करते अतः यूं ही नष्ट होते हैं मृत्यु को प्राप्त होते हैं ।
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गद्दार५ कूं कहा ग्यांन कहै, सफलै की कहाँ आस ।
रस वां कूं कहा रांम रस, सुकहि जगजीवनदास ॥३१॥
(५. गद्दार=विद्रोही)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो विश्वसनीय नहीं है, जिन्हें प्रभु पर भरोसा ही नहीं है. उन्हें अध्यात्म की बात क्या कहें और क्या आशा रखें । जो राम नाम का रसिक हो वह ही इस आनंद को जान पाता है ।
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गदार गुरा बस फलक ए, रस बिन रसवा होइ ।
कहि जगजीवन अलह आसिक, अहिसांन६ कहै जोइ ॥३२॥
(६. अहिसान=कृतज्ञता)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अविश्वसनीय जन का अविश्वास आकाश तक भी अविश्वसनीय रहता है व रसिकजन की रसिकता बिना रस के उनके स्वयं के आनंद रस से सोहती है । ऐसे भक्त जन के प्रभु स्वयं आशिक होते हैं । यह उनकी कृपा है ।
(क्रमशः)

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