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*पर उपकारी संत सब, आये इहि कलि मांहि ।*
*पीवैं पिलावैं राम रस, आप सवारथ नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)डाक्टर के प्रति उपदेश*
डाक्टर ने श्रीरामकृष्ण के लिए दवा दी, दो गोलियाँ, कहने लगे, ‘ये गोलियाँ दी हैं - पुरुष और प्रकृति !’ (सब हँसते हैं)
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ, पुरुष और प्रकृति एक ही साथ रहते हैं । तुमने कबूतरों को नहीं देखा ? नर तथा मादी अलग नहीं रह सकते । जहाँ पुरुष है, वहीं प्रकृति भी है । जहाँ प्रकृति है, वहीं पुरुष भी है ।
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आज विजयादशमी है । श्रीरामकृष्ण ने डाक्टर से कुछ मिष्टान्न खाने के लिए कहा । भक्तगण मिष्टान लाकर देने लगे ।
डाक्टर (खाते हुए) - भोजन के लिए थैन्क यू (Thank you) कहता हूँ; आपने जो ऐसा उपेदश दिया, उसके लिए नहीं । वह थैन्क यू मुँह से क्यों निकाला जाय ?
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श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - उनमें मन रखना । और क्या कहूँ, और थोड़ी थोड़ी देर के लिए ध्यान करना । (छोटे नरेन्द्र को दिखलाकर) देखो, इसका मन ईश्वर में बिलकुल लीन हो जाता है । जो सब बातें तुमसे कही गयी थीं –
डाक्टर - अब इन लोगों से कहिये ।
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श्रीरामकृष्ण - जिसे जैसा सह्य है उसके लिए वैसी ही व्यवस्था की जाती है । वे सब बातें ये सब लोग कभी समझ सकते हैं ? तुमसे कही गयी थीं, वह और बात है । लड़के को जो भोजन रुचता है और जो उसे सह्य है वही भोजन उसके लिए माँ पकाती है । (सब हँसते हैं)
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डाक्टर चले गये । विजया के उपलक्ष्य में सब भक्तों ने श्रीरामकृष्ण को साष्टांग प्रणाम करके उनके पैरों की धूल लेकर सिर से लगायी । फिर एक दूसरे को सप्रेम भेंटने लगे । आनन्द की मानो सीमा नहीं रहीं । श्रीरामकृष्ण को इतनी सख्त बीमारी है, परन्तु वे जैसे सब भूल गये हों । प्रेमालिंगन और मिष्टान्न भोजन बड़ी देर तक चल रहा है । श्रीरामकृष्ण के पास छोटे नरेन्द्र, मास्टर तथा दो-चार भक्त और बैठे हुए हैं । श्रीरामकृष्ण आनन्द से बातचीत कर रहे हैं । डाक्टर के बारे में बातचीत होने लगी ।
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श्रीरामकृष्ण - डाक्टर को और अधिक कुछ कहना न होगा । पेड़ का काटना जब समाप्त हो आता है तब जो आदमी काटता है वह जरा हटकर खड़ा हो जाता है । कुछ देर बाद पेड़ आप ही गिर जाता है ।
(मास्टर से) “डाक्टर बहुत बदल गया है ।”
मास्टर - जी हाँ ! यहाँ आने पर उसकी अक्ल ही मारी जाती है । क्या दवा दी जानी चाहिए, इसकी बात ही नहीं उठाते । हम लोग जब याद दिलाते हैं, तब कहते हैं – ‘हाँ-हाँ, दवा देनी है ।’
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बैठकखाने में कोई कोई भक्त गा रहे थे । श्रीरामकृष्ण जिस कमरे में हैं, उसी में सब के आने पर श्रीरामकृष्ण कहने लगे - “तुम सब गा रहे थे - ताल ठीक क्यों नहीं रहता था ? कोई एक बेतालसिद्ध था - यह भी वैसी ही बात हुई !” (सब हंसते हैं)
छोटे नरेन्द्र का आत्मीय एक लड़का आया हुआ है । खूब भड़कीली पोशाक पहने और नाक पर चश्मा लगाये । श्रीरामकृष्ण छोटे नरेन्द्र से बातचीत कर रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - देखो, इसी रास्ते से एक जवान आदमी जा रहा था । उसकी कमीज की आस्तीनों में ‘प्लेट’ पड़ी थी । उसके चलने का ढंग भी कैसा था ! रह-रहकर वह चादर हटाकर अपनी कमीज दिखाता था और इधर-उधर देखता था कि कोई उसकी कमीज देखता भी है या नहीं ! परन्तु जब वह चलता था तो साफ मालूम हो जाता था कि उसके पैर टेढ़े हैं ! मोर अपने पंख तो दिखलाता है, पर उसके पैर बड़े गन्दे होते हैं । इसी प्रकार ऊँट भी बड़ा भद्दा होता है, उसके सब अंग कुत्सित होते हैं ।
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नरेन्द्र का आत्मीय - परन्तु आचरण अच्छे होते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा है, परन्तु ऊँट कंटीली घास खाता है - मुख से धर-धर खून गिरता है, फिर भी वही घास खाता जाता है । आँख के सामने लड़का मरा, फिर भी संसारी ‘लड़का-लड़का’ की ही रट लगाये रहता है ।
(क्रमशः)

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