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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*संतरवाल लोटण देषि प्रसन, प्रीति कौ अंग ॥*
सरवर कँवल न बसंत रिति, ना बासना सुमीठ्ठ ।
कहि बषनां किहि कारणैं, भवरा भसम बयठ्ठ ॥१॥
न सरोवर में कमल ही खिले हैं, न अभी वसंत ऋतु का आगमन ही हुआ है और न मीठी सुगंध ही कहीं से आ रही है । फिर भी भ्रमर ने अपने शरीर पर भस्म का लेपन कर रखा है । बताइये, इसका क्या कारण हो सकता है ? ॥१॥
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*उत्तर ॥*
बन मैं होती केतकी, जरीजु काहू दंगि ।
भवर प्रीति कै कारणैं, भसम चढ़ावत अंग ॥२॥
केतकी = केवड़े (सुगन्धित पुष्प वाला वृक्ष जिस पर प्रायः भँवरा बैठता है), जंगल में दंगि = अग्नि लग जाने के कारण भस्म हो गया । भँवरे का उससे प्रेम होता है । अतः प्रीति के कारण ही भँवरा उसकी भस्म को अपने अंगों पर लेपन करता है अथवा उस केतकी के वृक्ष की भस्म पर बैठता है ॥२॥
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*श्रीदादू बचन प्रमाण ॥*
प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।
तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाव ॥३/१५३॥
मुझे परम-प्रियतम के पादपद्मों को देखने की उत्कट अभिलाषा है क्योंकि मुझे उनका स्पर्श करना है । कदाचित् प्रत्यक्षतः वे पादपद्म मुझे देखने को सुलभ न हों तो भी मैं उस स्थान को ही नमन करने की उत्कट अभिलाषी हूँ जिस भूमि पर परम प्रियतम ने अपने पादपद्म रखे हों ॥३/१५३॥
(क्रमशः)

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