रविवार, 16 जुलाई 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३५५

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५५)*
*राग सूहौ ॥२२॥(गायन समय दिन ९ से १२)*
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*३५५. परिचय । पंजाबी त्रिताल*
*अब हम राम सनेही पाया,*
*अगम अनहद सौं चित लाया ॥टेक॥*
*तन मन आतम ताकों दीन्हा,*
*तब हरि हम अपना कर लीन्हा ।*
*वाणी विमल पँच परानां,*
*पहिली शीश मिले भगवानां ॥१॥*
*जीवत जन्म सुफल कर लीन्हा,*
*पहली चेते तिन भल कीन्हा ।*
*अवसर आपा ठौर लगावा,*
*दादू जीवित ले पहुँचावा ॥२॥*
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जब साधक का चित्त वायुरहित प्रदेश में रखे हुए दीपक की तरह ध्याता ध्यान की वृत्तियों को त्यागकर निश्चल हो जाता है और केवल ध्येयाकारवृति बनी रहती है तब समाधि की स्थिति होती है । उस समाधि में साधक को अनाहदनाद सुनाई पड़ने लगता है उस समय वह प्रेमपात्र शास्त्रों से भी अगम्य भगवान् को देखता है ।
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जब सधक पहले अपने मन इन्द्रियों को भगवान् के समर्पण कर दें, तब ही साधक भगवान् को आत्मस्वरूपेण जान सकता है । जिन्होंने पांचों ज्ञानेन्द्रियों तथा मन प्राण इनको विशुद्ध करके भगवान् को समर्पण कर दिये वे ही जीवित अवस्था में भगवान् को जानकर अपना जीवन सफल कर लेते हैं ।
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जो पहले ही चेत जाता है वह जीता हुआ अपने अहंकाररूपी शिर को भगवान् के अर्पण करके आत्मा के विवेक द्वारा असत्य संसार से अपने को अलग करके सत्यस्वरूप ब्रह्म में स्थिति हो जाता है । महोपनिषद् में कल्पनारूप कलंक से रहित परमशुद्ध मल विक्षेपरहित परम पावन परमात्मा में जिस प्रकार जल की बूंद सागर में मिल जाती है उसी तरह यह वासना रहित बडभागी महात्मा ब्रह्म से एकता को प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

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