सोमवार, 17 जुलाई 2023

*(१)श्रीरामकृष्ण तथा गृहस्थाश्रम*

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*क्या जीये में जीवना, बिन दर्शन बेहाल ।*
*दादू सोई जीवना, प्रकट परसन लाल ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद १२३~गृहस्थाश्रम तथा संन्यासाश्रम*
*(१)श्रीरामकृष्ण तथा गृहस्थाश्रम*
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आज आश्विन की शुक्ला चतुर्दशी है । सप्तमी, अष्टमी और नवमी ये तीन दिन श्रीजगन्माता की पूजा और उत्सव में कटे हैं । दशमी को विजया थी । उस समय पारम्परिक मिलने-जुलने का जो शुभ संयोग था, वह भी हो चुका । श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ कलकत्ते के श्यामपुकुर नामक स्थान में रहते हैं ।
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शरीर में कठिन व्याधि है । गले में कैन्सर हो गया है । जब वे बलराम के घर पर थे तब कविराज गंगाप्रसाद देखने के लिए आये थे । श्रीरामकृष्ण ने उनसे पूछा था - 'यह रोग साध्य है या असाध्य ?’ इसका कोई उत्तर कविराज ने नहीं दिया । चुप हो रहे थे । अंग्रेजी चिकित्सा के डाक्टरों ने भी रोग के असाध्य होने का इशारा किया था । इस समय डाक्टर सरकार चिकित्सा कर रहे हैं ।
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आज बृहस्पतिवार है, २२ अक्टूबर १८८५ । श्यामपुकुर के एक दुमँजले मकान में श्रीरामकृष्ण का पलंग बिछाया गया है, उसी पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं । डाक्टर सरकार, श्रीयुत ईशानचन्द्र मुखोपाध्याय और भक्तगण सामने तथा चारों ओर बैठे हुए हैं । ईशान बड़े दानी हैं, पेन्शन लेकर भी दान किया करते हैं, ऋण करके दान करते हैं और सदा ईश्वर की चिन्ता में रहते हैं ।
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पीड़ा का हाल सुनकर वे देखने के लिए आये हुए हैं । डाक्टर सरकार चिकित्सा के लिए आते हैं तो छः सात घण्टे तक रहते हैं । श्रीरामकृष्ण पर उनकी बड़ी श्रद्धा है और भक्तों को तो वे अपने आत्मीयों की तरह मानते हैं ।
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शाम के सात बजे का समय है । बाहर चाँदनी छिटकी हुई है । पूर्णांग निशानाथ चारों ओर सुधावृष्टि कर रहे हैं । भीतर दीपक का प्रकाश है । कमरे में बहुत से आदमी बैठे हुए हैं । बहुतसे लोग श्रीरामकृष्णदेव के दर्शन करने के लिए आये हैं । सब के सब एकदृष्टि से उनकी ओर देख रहे हैं । उनकी बातें सुनने के लिए लोगों की इच्छा प्रबल हो रही है । उनके कार्य देखने के लिए लोग उत्सुक हो रहे हैं ।
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ईशान को देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं –
“जो संसारी व्यक्ति ईश्वर के पादपद्यों में भक्ति करके संसार का काम करता है, वह धन्य है, वह वीर है । जैसे किसी के सिर पर दो मन का बोझा रखा हुआ हो, और एक बरात जा रही हो । इधर तो सिर पर इतना बड़ा बोझा है, फिर भी वह खड़े होकर बरात को देखता है ।
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इस प्रकार संसार में रहना बिना अधिक शक्ति के नहीं होता । जैसे पाँकाल मछली, रहती तो कीच के भीतर है, परन्तु देह में कीच छू नहीं जाता । 'पनडुब्बी' पानी में डुबकियाँ लगाया करती है, परन्तु एक ही बार परों को झाड़ने से फिर पानी नहीं रह जाता ।
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“परन्तु संसार में यदि निर्लिप्त भाव से रहना है तो कुछ साधना चाहिए । कुछ दिन निर्जन में रहना जरूरी है, एक वर्ष के लिए हो या छः महीने के लिए, अथवा तीन महीने के लिए या महीने ही भर के लिए । उसी एकान्त में ईश्वर की चिन्ता करनी चाहिए । और मन ही मन कहना चाहिए - 'इस संसार में मेरा कोई नहीं है, जिन्हें मैं अपना कहता हूँ, वे दो दिन के लिए हैं, भगवान ही मेरे अपने हैं, वे ही मेरे सर्वस्व हैं । हाय ! किस तरह मैं उन्हें पाऊँ ?’
(क्रमशः)

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