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*निश्चल का निश्चल रहै, चंचल का चल जाइ ।*
*दादू चंचल छाड़ि सब, निश्चल सौं ल्यौ लाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७३ ब्रह्म भजन पद्धति । तिलवाड़ा
निश्चल को निश्चल ह्वै भजिये,
चंचल मति चंचल सब तजिये ॥टेक॥
रहते१ सौ रहता ह्वै रमिये२, मानष जन्म बादि३ क्यों गमिये४ ॥१॥
अस्थिर५ सौं अस्थिर६ ह्वै रहिये, बहते संग काहे को बहिये ॥२॥
पोत७ हि पोत८ मेलि तब सेवा, जन रज्जब भज अलख अभेवा९ ॥३॥४॥
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निश्चल ब्रह्म का भजन करने की रीति बता रहे हैं -
✦ निश्चल ब्रह्म को निश्चल होकर भज । हे चंचल बुद्धि ! सब प्रकार की चंचलता तथा माया रचित सम्पूर्ण चंचल संसार का राग त्याग कर
✦ सब में रहने१ वाले ब्रह्म के साथ सब में रहने वाला आत्मा होकर अर्थात आत्म स्वरूप में स्थित होकर ब्रह्मानन्द प्राप्ति रूप क्रीड़ा२ कर, मनुष्य जन्म को व्यर्थ३ क्यों खो४ रहा है ।
✦ स्थिर५ ब्रह्म के साथ स्थिर६ होकर रह । संसार प्रवाह में बहने वाले प्राणी के साथ रहकर संसार प्रवाह में क्यों बहता है ?
✦ आप७ ही आप८ में मिले अर्थात अपने आत्म स्वरूप ब्रह्म में आत्मा मिल जाय तब पूर्ण रूप से सेवा भक्ति सिद्ध होती है । इसलिये उक्त प्रकार अलख अद्वैत९ ब्रह्म का भजन कर ।
(क्रमशः)

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