सोमवार, 17 जुलाई 2023

*रसिक मुरारिजी*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*दादू जिसका दर्पण ऊजला,*
*सो दर्शन देखै मांहि ।*
*जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*रसिक मुरारिजी*
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*साधुन को चरणामृत ल्यावहु,*
*भावहि जानन दास पठायो ।*
*आनि कह्यो सब संतन खोरन१,*
*पान कस्यो वह स्वाद न आयो ।*
*भक्त सभा सब ही न चखावत,*
*जानत नैकि२ न छोड़ सु आयो ।*
*बूझि कह्यो तन कोढ़ रह्यो फिर,*
*ल्याय दियो पिय के सुख पायो ॥३५५॥*
एक दिन भंडारे में बहुत-से संत पधारे थे । रसिक मुरारिजी ने एक शिष्य के हृदय का भाव जानने के लिये कहा- " जाओ अच्छी प्रकार सब संतों के चरण धोकर चरणामृत ले आओ ।"
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चरणामृत लाकर उसने कहा-सब सन्तों के चरण धोकर चरणामृत१ ले आया हूँ । आपने पान करके कहा- "क्या कारण है, जैसा स्वाद नित्य आता था, वैसा नहीं आ रहा है ।"
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जितने भक्त सभा में बैठे हुए थे उन सब ही को चरणामृत देकर बोले-"मन को एकाग्र पान करो, कहाँ वह स्वाद है ?" वे लोग तो चरणामृत की महिमा और स्वाद को किंचित२ भी नहीं जानते थे, क्या बताते ?
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किन्तु आप तो परम निष्ठ थे जान गये और बोले- "किसी संत का चरणामृत छोड़ आये हो ।"
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पूछने से उसने कहा- "एक कोढ़ी भेष धारी तो रह गया है, उसका मैं नहीं लाया हूँ ।" आपने कहा-" उनका भी चरण धोकर लाओ ।" फिर उनका लाकर दिया तब उसे पान करने से आपको अति सुख प्राप्त हुआ ॥
(क्रमशः)

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