मंगलवार, 18 जुलाई 2023

*इंद्री दवन देखि प्रसन विरह कौ अंग ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*इंद्री दवन देखि प्रसन विरह कौ अंग ॥*
चकोर अंगारे क्यूँ चुगै चुगि देह जरावै ।
कहि बषनां किहिं कारणैं, कोइ मरम लखावै ॥३॥
चकोर अंगारे क्यों खाता है तथा खाकर क्यों अपनी देह को जलाता है ? बषनांजी पूछते हैं, कोई मुझे इसका रहस्य बताने का प्रयत्न करे कि आखिर अंगारे खाकर चकोर क्यों अपनी देह को जलाता है ?
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*उत्तर ॥*
स्यौ विभूति कबहूँ करै, लावै उस ठाँई ।
बषनां मस्तकि चंद है, मिलिबा कै ताँई ॥४॥
स्यौ = शिव को विभूति = भस्म अतीव प्रिय है । अतः वे, उस ठांई = अपने शरीर पर उसे लगाते हैं । वे मस्तक पर चन्द्रमा को धारण करते हैं । चकोर चन्द्रमा का प्रेमी है । चकोर को चन्द्रमा, शिव द्वारा धारण किये होने कारण मिलता नहीं । अतः प्रकाशवान अग्निपुंज को ही वह चन्द्रमा समझ बैठता है और अग्नि का भक्षण करता रहता है ॥४॥
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*श्रीदादू बचन प्रमाण ॥*
जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ ।
नैनहुँ मांही राखिये, दादू आप नशाइ ॥८४॥
इति प्रीति कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ३४॥साषी ५३॥
(क्रमशः)

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