सोमवार, 17 जुलाई 2023

*३७. निगुणां कौ अंग ३३/३६*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग ३३/३६*
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कहि जगजीवन मुजबरी७, सफ्र८ मंहि सोभै नांहि ।
कदम धरै औरें सुई, रहै न अल्लह मांहि ॥३३॥
(७. मुजबरी=पडोसीपन)     {८.सफ्र=सफर(यात्रा)}  
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीवन के सफर में व्यर्थ के नाते रिश्ते नहीं जोड़ने चाहिए । एक जरा से समय व स्थान का भरोसा नहीं है, जीव अपना अमूल्य समय ईश्वर में लगा दे ।
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कहि जगजीवन रांम रटि, मन की लखी न गंस९ ।
सकल दार१० चंदन भया, एक न भेद्या बंस ॥३४॥
(९. गंस=गांस=रुकावट)     (१०. दार=दारु=वृक्ष)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव राम सिमरण करें । इसमे मन द्वारा उत्पन्न बाधा को मत देखो । सभी वृक्ष चंदन हो उनमे एक भी बांस न हो सब जीव चन्दन से अमूल्य व नमनीय हो कोइ भी बांस सा अभेद्य न हो ।
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कहि जगजीवन रांमजी, अपस११ अरथ घृत चांम ।
रांम बिमुख नर देह थैं, सर्या न कोई काम ॥३५॥
{११. अपस=अस्पृश्य(न छूने योग्य)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि धन घृत व चाम अस्पृश्य है जो प्रभु विमुख  है वे भी मुख्यधारा से पृथक हैं । उनसे कोइ काम सिद्ध नहीं होता है ।
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पसु जोनी ही पवित्र है, रति१२ मांनै चरि घास ।
रांम बिमुख मध्यम मनिख१३, सु कहि जगजीवनदास ॥३६॥
(१२. रति=संतोष)     (१३. मनिख=मनुष्य) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पशु योनि ही पवित्र है जो उदर पूर्ति जितना तृण खाकर संतोष धारण करते हैं राम विमुख जन मध्यम योनि के हैं जिन्हें यह ज्ञान है कि राम नाम कितना महिमावंत है फिर भी नहीं सिमरते हैं ।
इति निर्गुणा कौ अंग संपूर्ण ॥३७॥
(क्रमशः)

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