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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५६)*
*राग सूहौ ॥२२॥(गायन समय दिन ९ से १२)*
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*कायाबेली ग्रन्थ राग सूहौ*
*३५६. पिंड ब्रह्माण्ड शोधन । पंजाबी त्रिताल*
*साचा सतगुरु राम मिलावे, सब कुछ काया मांहि दिखावे ॥टेक॥*
*काया माँही सिरजनहार, काया माँही ओंकार ।*
*काया माँही है आकाश, काया माँही धरती पास ॥१॥*
*काया माँही पवन प्रकाश, काया माँही नीर निवास ।*
*काया माँही शशिहर सूर, काया माँही बाजे तूर ॥२॥*
*काया माँही तीनों देव, काया माँही अलख अभेव ।*
*काया माँही चारों वेद, काया माँही पाया भेद ॥३॥*
*काया माँही चारों खानी, काया माँही चारों वाणी ।*
*काया माँही उपजै आइ, काया माँही मर मर जाइ ॥४॥*
*काया माँही जामै मरै, काया माँही चौरासी फिरै ।*
*काया माँही ले अवतार, काया माँही बारम्बार ॥५॥*
*काया माँही रात दिन, उदय अस्त इकतार ।*
*दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार ॥६॥*
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इस कायावेली के प्रकरण में काया को वेली के समान उत्प्रेक्षा करने से उसकी शीत उष्णता के द्वारा असहिष्णुता बताकर इसे परमात्मा के उद्यान का स्वतन्त्र विधान मानकर वर्णित किया है । जो तत्त्व ब्रह्माण्ड में हैं वही सब पिण्ड में भी देखे जाते हैं इस दार्शनिक सिद्धांत का प्रमाणों के द्वारा विस्तार किया गया है ।
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यह सही है कि यह ब्रह्माण्ड विशाल है । अतः उसके रहस्य को जानने की इच्छा रखने वाले सही रूप से उसको देख नहीं पाते । तथा उसका देखना भी साधन एवं पर्याप्त कालसाध्य है । जबकि यह शरीर नियत काल तक रहने वाला है । ब्रह्माण्ड का संपूर्ण दर्शन करना अशक्य है, यह समझकर ब्रह्माण्ड के समस्त तत्त्व स्पष्ट यथावत् दीख जाय इसलिये इसी शरीर में ही ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया गया है ।
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जिसने इस ब्रहमाण्ड का निर्माण किया है उसी ने ही पाँच भौतिक शरीर का भी निर्माण किया है । दोनों का कर्ता एक ही है । अतः क्रिया भी एक जैसी ही होगी । अल्पज्ञजीव ब्रह्माण्ड के सर्वावयव का दर्शन एक जगह रहकर नहीं कर सकता । इसलिये प्रत्यासत्या(समीप सम्बन्ध से) पहले शरीर ब्रह्माण्ड का ही दर्शन कराते हैं ।
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शिवसहिंता के द्वितीय पटल में लिखा है कि – जो ब्रह्माण्ड में पदार्थ हैं, वे सब इसी शरीर में भी रहते हैं । इसी शरीर में सात द्वीपों से युक्त सुमेरु विराजता है । नदियाँ, सात समुद्र, पर्वत, क्षेत्र, क्षेत्रपालक, ऋषि, मुनि सारे नक्षत्र, ग्रह पुण्य तीर्थ, पीठ और उनके देवता, सृष्टि के बनाने वाले सूर्य चन्द्रमा आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह सब विद्यमान है ।
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त्रिलोकी में जितने भी पदार्थ वे सब इस देह को वेष्टित करके सुमेरु के चारों तरफ विद्यमान हैं । जो इन सबको जानता है वह निश्चित योगी है । अष्ट कलाओं से युक्त मेरुश्रृंग में सुधारश्मि हैं वह नीचे मुखकर के सुधा की दिनरात वर्षा करती है । अतः अमृत सूक्ष्मभेद से दो प्रकार का है । मन्दाकिनी का जल इडा मार्ग के द्वारा दिनरात बहता है जिससे शरीर का पोषण होता रहता है ।
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इस दर्शन के लिये आत्मतत्त्व के उपदेष्टा गुरु की आवश्यकता होती है । गुरु देह में स्थित सभी रहस्यों का वर्णन कर उसके देहाभ्यास को मिटाता है । तत्पश्चात् पवित्रात्मा होकर वह जीव परमानन्दरूप राम का दर्शन कर पाता है । परमात्मा का दर्शन करा देना उसका अन्तिम और पुनीत कर्तव्य माना जाता है । इसी क्रिया से ही उसका गुरुत्व सफल माना जाता है ।
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ऐसा ब्रहमनिष्ठ गुरु चराचर नियामक राम का दर्शन इसी शरीर में करा देता है । जैसे कि उपनिषदों में लिखा है कि परमात्मा आत्मा में स्थित रहता हुआ सबका नियमन करता है रूप नामाधीन होता है । अतः रूप के साथ उसका नाम जो प्रणवरूप भी इसी शरीर में रहता है । जैसे कि योगाचार्य पतंजलि ने कहा है कि तस्य वाचकः प्रणवः उस ईश्वर का वाचक नाम ओंकार है । ईश्वर समस्त क्रिया कारण से असंपृक्त रहते हुए एवं सर्वव्यापक होने पर भी इस शरीर में निवास करता है ।
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जैसा कि ऋगवेद में लिखा है कि – “सहस्त्रशीर्षापुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्” इत्यादि वह ईश्वर हजार शिर वाला हजार आँख पैर वाला नाभि से दश अंगलि ऊपर निवास कर सभी इन्द्रियों को अनुप्राणित करता है । गीता में भी भगवान् ने इसी तथ्य की पुष्टि की है । सब भूतों का ईश्वर होते हुए भी अन्तर्यामी होकर इन्द्रियप्रेरक होने से परमात्मा हृदय कमल पर विश्राम करता है ।
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यह विषय भगवान् की ध्रुवस्तुति में वर्णित है । इसी कारण से परमात्मा की पुरुष संज्ञा सार्थक होती है । पुरि अर्थात् शरीर में शेते सोता है उसको पुरुष कहते हैं । श्रुतिसारभूत प्रणव जीव के श्वासप्रश्वास में रहता है । वहीँ प्रणव परमात्मा की सत्ता का बोध कराता है । जिस प्रकार नाम से नामी का बोध होता है ऋगवेद में त्रिधावृद्धों वृषभोरोरवीति महो देवोमर्त्यमाविवेश इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार ने यह पूछा की महान् देव कौन हैं, शब्द ही महान् देव हैं उसी देव के साथ हमारा ऐक्य हो यही शास्त्र का प्रयोजन है ।
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सर्वोपनिषत्सारसंग्रह में लिखा है कि – ओंकार को ही ईश्वर समझो और वह प्रत्येक प्राणि के हृदय में स्थित है । उस सर्वव्यापी ओंकार को जानकर धीर मनुष्य शोक को प्राप्त नहीं होता । जैसे इस संसार में विशाल आकाश का दर्शन होता है उसी तरह इस शरीर में भी एक आकाश है । वह देह से परिछिन्न होने पर भी व्यापक माना जाता है ।
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योगीजन कण्ठस्थित विशुद्ध चक्र को आकाश का स्थान बतलाते हैं । समवाय सम्बन्ध से शब्द आकाश में रहता है वैसे ही अव्यक्तरूप परा पश्यन्ती इत्यादि वाणियों की स्थिति इसी शरीर में मानी गई है । जिस तरह सभी को धारण करने के कारण पृथ्वी जगत् में व्याप्त है । उसी तरह शरीर में भी गन्धवती पृथ्वी रहती है और वह नित्य न होकर अनित्य है ।
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जैसा कि तर्कसंग्रह में कहा है कि –
पृथ्वी दो प्रकार की होती है नित्य अनित्य नित्य पृथ्वी परमाणु रूप हैं अनित्य पृथ्वी कार्यरूप हैं । इसके कार्य भी तीन प्रकार के हैं । शरीर, पृथ्वी, इन्द्रियपृथ्वी एवं विषयपृथ्वी । शरीर पृथ्वी ही पंचभूतों में एक भूत बन कर हमारे शरीरों में निवास करती हैं ।
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इसी शरीर में रूपरहित स्पर्शगुण वाला पवन भी रहता हैं । वह प्राण अपान आदि भेद से पांच प्रकार का है । उन पांचों की चेष्टाओं से दैहिक समस्त क्रियाये चलती हैं । शब्द के उच्चारण में भी यही वायु कारण माना गया है । जैसा कि पाणिनीयशिक्षा में कहा है आत्मा बुद्धि से युक्त होकर मन में विवक्षा को उत्पन्न करता है और वह जठराग्नि को आहत कर शरीरस्थ पवन को प्रेरित करता है ।
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वही प्रेरित हवा तत्तत्स्थानों से टकरा कर वर्णों को प्रेरित करता है । प्राणरूप वायु तो प्रसिद्ध हैं । उस वायु का निवास अनाहत्त चक्र में हैं ऐसा योगी जन मानते हैं । प्राणायाम आदि के द्वारा पापों का नाश कर परमात्मा के दर्शन में यही वायु परम्परया कारण मानी जाती हैं ।
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जीवयतीति जीवन इस व्युत्पत्ति से जीवन शब्द जल वाची हैं वह शरीर धारण करने में कारण हैं । रसरूप होने से आनन्द का भी कारण हैं । इसका अधिष्ठाता देव वरुण है । तर्कसंग्रह में कहा है कि शरीरं वरुणलोकके प्रसिद्धम् । रस्यते आस्वाद्यते इस व्युत्पत्ति से रसनाग्राह्य इस गुण का स्थान स्वाधिष्ठानचक्र है । सभी साधनों के रहने पर भी रस तत्त्व के बिना लावण्य का विनाश देखा जाता है ।
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“चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्योऽजायत” इस श्रुति के अनुसार प्रकाश का असाधारण कारण रूप सूर्य भी इसी शरीर में हैं और आँखों की पुतली के अग्रभाग में रहता है । जिससे जीव चराचर जगत् का दर्शन कर पाता है ॥ मनरूपी चन्द्रमा जो समस्त हृदय को आल्हादित करता है वह भी इसी शरीर में रहता है ।
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इडा पिंगला नाड़ी सूर्य और चन्द्र रूप हैं । पुराण के अनुसार दोनों नेत्रों को सूर्य चन्द्रमा के समान माना हैं । संपूर्ण लोक का प्रकाशक होने से यह सूर्य सविता अर्थात् सूते इति सविता इस व्युत्पत्ति के अनुसार तथा “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च इस श्रुति से परब्रह्म वाचक माना जाता है” इस तरह बाह्य जगत् की तरह आन्तर्जगत् को प्रकाशित करने के कारण यह सूर्य ईश्वर हैं ।
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लोक में अनेक प्रकार की ध्वनियाँ सुनी जाती हैं वैसे ही अन्तर्जगत् में भी अनाहतनाद की ध्वनि सुनाई पड़ती हैं । जब तक मूलाधार पर अधिष्ठित ब्रह्मग्रन्थि का ठीक प्रकार से भेदन नहीं होता तब तक योगी हृदयाकाश में स्थित अनाहतनाद का श्रवण नहीं कर पाता ।
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इस शरीर में ही ब्रहमा विष्णु महेश त्रिदेव का निवास हैं । वह बाह्य जगत् की तरह सृष्टिपालन तथा संहाररूप क्रियाओं को करते हैं । जैसा कि श्री मद्भागवत् में कहा है परमात्मा ने सृष्टि बनाकर उसी में प्रविष्ट हो गया । अतः आत्मरूप से सभी अंग को पुष्ट करते हुए नारायण के रूप में विराजते हैं । अहंकार रूप शिव भी अभिमानयुक्त होकर मैं हूँ ऐसा अनुभव करता है । बुद्धिरूप ब्रह्मा कर्तव्य अकर्तव्य का चिन्तन करता हैं । इस तरह इसी शरीर में तीनों देवों की चेष्टायें अनुभव की जा सकती हैं ।
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अद्वैत ब्रह्म साक्षीरूप से शरीर में स्थित हैं । उसी ब्रह्म का आश्रय लेकर ब्रह्मादि देवता अपनी-अपनी क्रियायें करते हैं । शुद्ध ब्रह्म किसी भी क्रिया में प्रवृत्त नहीं होता । गीता में कहा है कि – पार्थाऽस्ति कर्तव्यम् । जिसके द्वारा समस्त यथार्थतत्त्व का बोध हो ऐसी ज्ञानराशि को वेद कहते हैं ।
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जैसा कि विद्वानों ने कहा है कि – प्रत्यक्ष अनुमान आदि के द्वारा जिस तत्त्व का बोध नहीं होता वह तत्त्व अनायास ही वेद के द्वारा जाना जाता है । यही वेद का वेदत्व हैं । इस शरीर में ऋग, यजु आदि वेद नाभिहृदय कण्ठ मुख आदि स्थानों में रहता है । साधु जन नामाभ्यास को ऋग, जरणा को यजुः, सहनशक्ति को साम, और अनुभव को अथर्ववेद कहते हैं ।
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जीव ब्रह्म के अभेद ज्ञान से मुक्ति होती हैं । तथापि यहाँ भेदज्ञान का तात्पर्य यह है की जड और चेतन का भेद ज्ञान भी मोक्ष में सहयोगी होता हैं । आत्म का चेतनत्व और शरीर आदि का जडत्व ज्ञान ही भेदज्ञान हैं । जब तक आत्मा का चेतनत्वेन बोध न हो तब तक उसमें लय होने की कामना ही नहीं होती और जब तक लय की कामना न हो तो मोक्ष की कामना कैसे हो सकती हैं । जड़ और चेतन के परस्पर विजातीय होने के कारण विलय नहीं हो सकता ।
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जरायुज अण्डज आदि चार प्रकार के प्राणियों का निवास भी इसी शरीर में है । इसी शरीर में आनन्द, संकल्प, प्रवृत्ति, प्रकाशरूप जीवों के चारों भेद रहते हैं । इसी में वाणी के चारों भेद रहते हैं । मूलचक्र में परावाणि, नाभि में पश्यन्ती, हृदय में मध्यमा एवं कण्ठ में वैखरी वाणि निवास करती हैं । वैखरी वाणी से उच्चरित नाद परश्रवण ग्राह्य होता है । मध्यमा वाक् से निकली हुई ध्वनि स्फोट माना जाता है । इसी में विविध भाव क्रम से उत्पन्न और विलीन होते हैं । संस्कारों से उत्पन्न भाव स्मृतिरूप अथवा अनुभव रूप हैं । और उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं । इसी में जन्म मरण का चक्र चलता रहता है ।
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इसी तरह शरीर में चौरासी लाख योनियों के अलग-अलग भावों का अनुभव किया जा सकता है इसी शरीर में ईश्वर के विविध अवतारों का स्थान निश्चित किया गया है । जैसे रामअवतार की प्रवृत्ति, कृष्ण का लीलाचरित्र, नरनारायण का वैराग्य, तप निवृत्ति, परशुराम और नृसिंह की असहिष्णुता, वामन अवतार की ग्रहण करने की इच्छा । इस प्रकार विविध अवतारों के भाव सूक्ष्म रूप से इस शरीर में होते रहते हैं । इसी पिण्ड में सद्बुद्धि और असद्बुद्धि भी रहती हैं ।
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ज्ञानप्रकाशरूप होने के कारण दिन के समान है और अज्ञान तमो बहुल होने के कारण मोहरूपी रात्रि के समान है क्योंकि जब तक ज्ञान का उदय न हो तब तक जीव मोह रूपी रात्रि में शयन करता रहता है । इसी भाव से श्रीदादूजी महाराज लिखते हैं कि – “काया मांही रात दिन ।” मैंने परमगुरु को प्राप्त किया हैं । जिस गुरु ने अभेद ज्ञान कराकर मुझे कृतकृत्य कर दिया । जिसने मेरे हृदय में अद्वैत निष्ठा पैदा कर दी । “तत्त्वमसि” आदि महावाक्यों के तात्पर्यार्थ को समझा कर आत्मस्वरूप का बोध कराया ।
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नाम रूप स्थान अवस्था देवता
परावाणी बीज नाभि तुरीया सोऽहं
पश्यन्ति अँकुर हृदय सुषुप्ति ईश्वर
मध्यमा पात कंठ स्वप्न विष्णु
वैखरी वृक्षविस्तार मुख जाग्रत ब्रह्मा
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चक्रनाम पंखुड़ी अक्षर देवता स्थान
१.आधार ४ ४ गणेश गुदा
२.स्वाधिष्ठान ८ ८ ब्रह्मा लिंग
३.मणिपुर १० १० वायु नाभि
४.निरंजन ८ ८ मन उदर
५.उद्यद १२ १० सूर्य हृदय
६.विशुद्ध १६ १६ चन्द्रमा कण्ठ
७.बत्तीसा ३२ ३२ विष्णु तालु
८.आज्ञा २ २ महादेव मस्तक
९.ब्रह्मरन्ध्र १००० १००० दशोंदिशा दशम द्वार
(क्रमशः)

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