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*दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग ।*
*देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७४ मन स्वभाव । शूल ताल
मन किन१ तज हूं निलज विषया बट२,
हटक्यो३ रहत नांहि हरिहायो,
विषय खेत खूंदे४ धरणी घट५ ॥टेक॥
मगन मुदित मन बहत६ दश हुं दिशि,
राख्यों रहत न नाम निकट नट ।
श्रवणों सुनत नांहि मति मेरी,
रोम रोम लागी रामा७ रट ॥१॥
चंचल चोर चरण निज भूल्यो, ।
खलक८ ही लागि किये खाली षट९
सदगुरु साधु वेद बुध बरजत,
कहत हिं करत सु करत निघर घट१० ॥२॥
विविध भांति मन को समझावत,
इन न गह्यो सुंदर सरिता तट ।
रज्जब रिंद११ रूठि रह्यों हरि सो,
पुकारि पुकारि प्राण तोरी लट ॥३॥५॥
मन का स्वभाव बता रहे हैं -
✦ अरे निर्लज्ज मन - तू विषय रूप भोजन२ क्यों१ नहीं तजता ? अरे धृष्ट५ ! तू तो रोकने३ पर भी नहींरुकता, जैसे हरिहाया पशु पृथ्वी के हरे खेतों में बारंबार जाकर खेती को खाता है और पेरों से रौंद४ कर नष्ट करता है, वैसे ही तू बारं बार विषयों में जाता है ।
✦ यह मन विषय रस में निमग्न होकर प्रसन्नता से दशों दिशाओं में जाता६ है किंतु यह नट प्रभु नाम के पास तो रखने पर भी नहीं रहता । मेरी बुद्धि के विचार तो श्रवणों से सुनता ही नहीं है । इसके तो रोम रोम में सुन्दर स्त्री७ का ही चिंतन रहता है ।
✦ यह चंचल चोर मन निज प्रभु के चरण कमलों को भूल गया है और संसार८ में लगकर इसने पंच इन्द्रिय तथा हृदय इन छ:९ को भगवद् भावना से खाली कर दिया है । सदगुरु, संत, वेद और विद्वान इसे निषिद्ध विषयों से जाने से रोकते हैं किंतु यह निर्लज्ज१० उनके कहते कहते ही निषिद्ध विषयों में जाना रूप क्रिया करने लगता है ।
✦ नाना प्रकार से मनको समझाते हैं किंतु इसने भगवद् भक्ति रूप सुंदर नदी का तट तो अभी तक ग्रहण नहीं किया है । यह निरंकुश११ मन हरि से रुष्ट हो रहा है । इसे पुकार पुकार कर कहते कहते हमारी श्वास रूप लट भी टूट गई है अर्थात श्वास समाप्त होने आये हैं किंतु इसने हमारी एक भी बात नहीं मानी है । ऐसा इस मन का स्वभाव है ।
(क्रमशः)

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