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*तेज पुंज की सुन्दरी, तेज पुंज का कंत ।*
*तेज पुंज की सेज पर, दादू बन्या बसंत ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
अथ राग वसंत १४(गायन समय प्रभात ३-६ बजे तथा वसंत ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६७ विनय । चौताल
वसंत बन्यो खेलो गोपाल, अन्तर्यामी सुन दयाल ॥टेक॥
वपु वन मोरे रोम राय१, रम हु राम अवसर विहाय२ ॥१॥
पंच सखी रही३ करि श्रृंगार, रमो राम लाओ न वार ॥२॥
सब अंगन सरें सकल काम, जान राय जब मिलैं राम ॥३॥
तन मन मंगल ह्वै उच्छाह, जन रज्जब पाये सु नाह४ ॥४॥२॥
१६७-१६८ में दर्शनाथ विनय कर रहे हैं -
✦ अन्तर्यामी दयालु गोपाल ! मेरी विनय सुनिये । मैं वसंत रूप बनकर आपकी क्रीड़ा के लिये उपस्थित हूं । आप मुझ में आकर खेलिये ।
✦ हे राम ! आप शीघ्र ही पधार कर मेरे शरीर रूप वन के रोम रूप वृक्ष-पंक्ति१ में रमण कीजिये । आपके बिना मेरा यह सुन्दर समय व्यर्थ जा२ रहा है ।
✦ पंचेन्द्रियरूप पंच सखि संयम रूप श्रृंगार करके स्थित३ हैं । राम ! इनसे क्रीड़ा कीजिये । देर न कीजिये ।
✦ हे जानराय राम ! जब आप मुझे मिलेंगे तब मेरे सभी अंगों के सब काम सिद्ध हो जायेंगे अर्थात दर्शन से नेत्र, शब्द सुनकर श्रवण । ऐसे ही सब अंगों की अभिलाषा पूर्ति रूप कार्य सिद्ध हो जायेंगे ।
✦ जब मेरे स्वामी४ मुझे प्राप्त होंगे तब मेरे तन मन में मंगलपूर्ण उत्सव होगा ।
(क्रमशः)

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