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*सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल ।*
*दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(३)नित्य-लीला-योग*
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दिन का पिछला पहर है, डाक्टर आये हुये हैं । अमृत(डाक्टर के लड़के) और हेम भी डाक्टर के साथ आये हैं । नरेन्द्र आदि भक्त भी उपस्थित हैं ।
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श्रीरामकृष्ण एकान्त में अमृत के साथ बातचीत कर रहे हैं । पूछ रहे हैं, ‘क्या तुम्हें ध्यान जमता है ?’ और कह रहे हैं, ‘क्या जानते हो, ध्यान की अवस्था कैसी होती है ? मन तैलधारा की तरह हो जाता है । ईश्वर की ही चिन्ता रह जाती है । उसमें कोई दूसरी चिन्ता नहीं आती ।’ अब श्रीरामकृष्ण दूसरों से बातचीत कर रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण (डाक्टर से) - तुम्हारा लड़का अवतार नहीं मानता । यह अच्छी बात है । नहीं मानता तो न सही ।
“तुम्हारा लड़का बड़ा अच्छा है । और होगा भी क्यों नहीं ? बम्बई-आम के पेड़ में कभी खट्टे आम भी लगते हैं ? ईश्वर पर उसका कैसा विश्वास है ! ईश्वर पर जिसका मन है, आदमी तो बस वही है । मनुष्य और मन-होश । जिसमें होश है - चैतन्य है, जो निश्चयपूर्वक जानता है कि ईश्वर सत्य हैं और सब अनित्य, वही वास्तव में मनुष्य है । अवतार नहीं मानता तो इसमें क्या दोष ?
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‘ईश्वर हैं, यह सम्पूर्ण जीव-जगत् उनका ऐश्वर्य है, ‘इसे मानने से ही हो गया । - जैसे कोई बड़ा आदमी और उसका बगीचा ।
“बात यह है कि दस अवतार हैं, चौबीस अवतार हैं और फिर असंख्य अवतार भी हैं । जहाँ कहीं उनकी शक्ति का विशेष प्रकाश है, वहीं अवतार हैं । मेरा यही मत है ।
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“एक बात और है, जो कुछ देख रहे हो यह सब वे ही हुए हैं । - जैसे बेल के बीज, खोपड़ा, गूदा, तीनों को मिलाकर एक बेल है । जिनकी नित्यता है, उन्हीं की लीला भी है । नित्य को छोड़कर केवल लीला समझ में नहीं आती । लीला के रहने के कारण ही, लीला को छोड़-छोड़कर लोग नित्य में जाया करते हैं ।
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"जब तक अहं बुद्धि रहती है तब तक लीला के परे मनुष्य नहीं जा सकता । ‘नेति नेति’ करके ध्यान-योग द्वारा नित्य में लोग पहुँच सकते हैं, परन्तु कुछ भी छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि यह सब वे ही हुए हैं - जैसा मैंने कहा – बेल ।”
डाक्टर - बहुत ठीक है ।
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श्रीरामकृष्ण - कचदेव निर्विकल्प समाधि में थे । जब समाधि छूटी तब एक ने पूछा, ‘आप इस समय क्या देखते हैं ?’ कचदेव ने कहा, ‘मैं देख रहा हूँ, संसार मानो उनसे मिला हुआ है । वे ही पूर्ण हैं । जो कुछ देख रहा हूँ, सब वे ही हुए हैं । इसमें से क्या छोडूँ और क्या पकडूँ, कुछ समझ में नहीं आता ।’
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“बात यह है कि नित्य और लीला का दर्शन करके दास-भाव में रहना चाहिए । हनुमान ने साकार और निराकार दोनों का साक्षात्कार किया था । इसके बाद, दास-भाव से - भक्त के भाव से रहे थे ।”
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मणि (स्वगत) - नित्य और लीला, दोनों को लेना होगा । जर्मनी में वेदान्त के प्रवेश के समय से यूरोपीय पण्डितों में भी किसी किसी का मत ऐसा ही है; परन्तु श्रीरामकृष्ण ने तो कहा है कि सम्पूर्ण रूप से त्याग – कामिनी-कांचन का त्याग - हुए बिना नित्य और लीला का साक्षात्कार नहीं होता । सच्चे साधक को ठीक ठीक त्यागी, सम्पूर्ण अनासक्त होना चाहिए । यहीं पर उनमें तथा हेगल जैसे यूरोपीय पण्डितों में भेद है ।
(क्रमशः)

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