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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४९)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३४९. समता ज्ञान । त्रिताल*
*इन बातनि मेरा मन मानै ।*
*दुतिया दोइ नहीं उर अंतर,*
*एक एक कर पीव कौं जानै ॥टेक॥*
*पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में,*
*भ्रम न जीव काहू तैं आनै ।*
*होइ दयालु दीनता सब सौं,*
*अरि पाँचनि को करै किसानै ॥१॥*
*आपा पर सम सब तत चीन्हैं,*
*हरि भजै केवल जस गानै ।*
*दादू सोई सहज घर आनै,*
*संकट सबै जीव के भानै ॥२॥*
समस्त ज्ञानपूर्वक ब्रहमज्ञान की विशेषता श्रीदादूजी महाराज बतला रहे हैं – मेरा मन द्वैतबुद्धि से पैदा होने वाले यह तेरा है और यह मेरा है इस द्वैतबुद्धि से रहित शुद्ध अद्वैत ज्ञान से ही प्रसन्न होता है । अतः साधक को सर्वत्र अद्वैतभाव से सब में ब्रह्मदृष्टि करके अपने प्रियतम ब्रह्म को ही जानना चाहिये ।
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सब प्राणियों में ब्रह्म का ही दर्शन करो । काम क्रोध को जीत कर इन्द्रियों की विषयों में जो आसक्ति है उसको त्याग दो । किसी के भी साथ में भेद व्यवहार मत करो । दयालु हो कर सबके साथ नम्रता का व्यवहार करो ।
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अपना पराया भाव त्याग कर सब जगह पर ब्रह्म को ही देखो । हरिभजन करते हुए हरि का ही यश गावो । समत्व भाव से युक्त ज्ञानी महात्मा ही जीवों के संकट को मिटाकर निर्द्वन्द्व ब्रह्म में प्राणियों के मन को ब्रह्म में स्थिर कर सकता है ।
(क्रमशः)

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