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*चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध ।*
*दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७५ मनोपदेश । त्रिताल
अरे मन करि रे सूक्षम त्याग,
सदगुरु शब्द समझि उर अंतरि, मेल्हि१ मनोरथ माग२ ॥टेक॥
आन३ अनेक चिंत तजि चेतन, परम पुरुष सौं लाग ।
सकल ज्ञान गुण समझ सयाने, थांभि४ दशों दिशि बाग५ ॥१॥
स्वर्ग पताल जंजाल६ छाड़ि मन, तोरि७ जगत सों ताग ।
अकलि८ अनंत विलोकि विचार हु, विविध वासना दाग९ ॥२॥
स्वप्ने की संपति करि संग्रह, सब समझेगा जाग ।
जन रज्जब जगदीश भजनकर, जे शिर मोटे भाग ॥३॥६॥
१७५-१७८ में मन को उपदेश कर रहे हैं -
✦ अरे मन ! सूक्ष्म संस्कारों को त्याग दे ! सदगुरु के शब्दों को हृदय में समझकर मनोरथों का मार्ग२ छोड़१ दे ।
✦ अन्य३ अनेकों का चिंतन त्यागकर परम पुरुष चेतन प्रभु के चिंतन में लग । हे चतुर ! संपूर्ण दैवी गकुण और ज्ञान के प्रभाव को समझकर दशों दिशाओं में भ्रमण करने की प्रवृति रूप बागडोरि५ को रोक४ अर्थात भ्रमण करना छोड़ ।
✦ अरे मन ! स्वर्ग पाताल आदि रूप जगत६-जाल को त्याग दे । जगत् से संबन्ध करना रूप धागा तोड़७ दे । नाना प्रकार की भोगवासनाओं को जलाकर९, बुद्धि८ द्वारा विचार करके अनन्त ब्रह्म का साक्षात्कार कर ।
✦ जैसे प्राणी स्वप्न में धन राशि संग्रह करके प्रसन्न होता है किंतु जागने पर उसे मिथ्या समझता है, वैसे ही ज्ञान जाग्रत में आयेगा तब तू भी सब को मिथ्या समझेगा । यदि अपने भाग्य को विशाल बनाना चाहता है, तो जगदीश्वर का भजन कर ।
(क्रमशः)

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