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*जे जन हरि के रंग रंगे, सो रंग कदे न जाइ ।*
*सदा सुरंगे संत जन, रंग में रहे समाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)भक्तियोग तथा ज्ञानयोग*
डाक्टर - ज्ञान होने पर मनुष्य अवाक् हो जाता है, आँखें मुँद जाती है और आँसू बह चलते हैं । तब भक्ति को आवश्यकता होती है ।
श्रीरामकृष्ण - भक्ति स्त्री है । इसीलिए अन्त: पुर तक उसकी पैठ है । ज्ञान बहिर्द्वार तक ही जा सकता है । (सब हँसते हैं)
डाक्टर - परन्तु अन्त:पुर में हरएक स्त्री को घुसने नहीं दिया जाता, वेश्यायाएँ वहाँ नहीं जाने पाती । ज्ञान चाहिए ।
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श्रीरामकृष्ण - यथार्थ मार्ग जो नहीं जानता, परन्तु ईश्वर पर जिसकी भक्ति है - उन्हें जानने को जिसे इच्छा है, वह भक्ति के बल पर ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है । एक आदमी बड़ा भक्त था, वह जगन्नाथजी के दर्शन करने के लिए घर से निकला । पुरी का कोई रास्ता वह जानता नहीं था, - दक्षिण की ओर न जाकर वह पश्चिम की ओर चला गया । रास्ता भूल गया था सही, परन्तु व्याकुल होकर आदमियों से वह पूछा करता था । लोगों ने कह दिया, ‘यह मार्ग नहीं है, उस मार्ग से जाओ ।’
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अन्त में वह भक्त पुरी पहुँच ही गया और वहाँ उसने जगन्नाथजी के दर्शन भी किये । देखो, न जानने पर भी कोई न कोई मार्ग बतला ही देता है ।
डाक्टर - वह भूल तो गया था ।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ऐसा हो जाता है जरूर, परन्तु अन्त में वह पाता भी है ।
एक ने पूछा - ईश्वर साकार भी हैं या निराकार ?
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श्रीरामकृष्ण - वे साकार भी हैं और निराकार भी । एक संन्यासी जगन्नाथजी के दर्शन करने गया था । जगन्नाथजी के दर्शन करके उसे सन्देह हुआ कि ईश्वर साकार हैं या निराकार । हाथ में उसके दण्ड था, उसी दण्ड को वह जगन्नाथजी की देह में छुआने लगा, यह देखने के लिए कि दण्ड छू जाता है या नहीं । एक बार दण्ड के एक सिरे से छुआया तो दण्ड नहीं लगा, फिर दूसरे सिरे से छुआया तो वह उनकी देह से लग गया । तब संन्यासी ने समझा कि ईश्वर साकार भी हैं और निराकार भी ।
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“परन्तु इसको धारणा करना बड़ा कठिन है । जो निराकार हैं, वे फिर साकार कैसे हो सकते हैं ? यह सन्देह मन में उठता है । और यदि वे साकार हों भी, तो ये अनेक रूप क्यों हैं ?”
डाक्टर - उन्होंने नाना रूपों की सृष्टि की है, इसलिए वे साकार हैं । उन्होंने मन की सृष्टि की है, इसलिए वे निराकार हैं । वे सब कुछ हो सकते है ।
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श्रीरामकृष्ण - ईश्वर को प्राप्त किये बिना ये सब बातें समझ में नहीं आतीं । साधक को वे अनेक भावों में और अनेक रूपों में दर्शन देते हैं । एक के पास गमला भर रंग था । बहुतेरे उसके पास कपड़े रँगाने के लिए आया करते थे । वह आदमी पूछा करता था, 'तुम किस रंग से रँगाना चाहते हो ?' किसी ने कहा, 'लाल रंग से ।'
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बस, वह आदमी गमले में कपड़ा छोड़ देता था और निकालकर कहता था, 'यह लो, तुम्हारा कपड़ा लाल रंग से रँग गया । कोई दूसरा कहता था, 'मेरा कपड़ा पीले रंग से रँग दो । रंगरेज उसी समय उसका कपड़ा भी उसी गमले में डुबाकर कहता था, 'यह लो, तुम्हारा पीले रंग से रँग गया ।' अगर कोई आसमानी रंग से रँगाना चाहता था, तो वह रंगरेज फिर उसी गमले में डुबाकर कहता, 'यह लो, तुम्हारा आसमानी रंग से रँग गया ।'
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इसी तरह, जो जिस रँग से कपड़ा रँगाना चाहता था, उसका कपड़ा उसी रंग से और उसी गमले में डालकर वह रँग देता था । एक आदमी यह आश्चर्यजनक कार्य देख रहा था । रंगरेज ने उससे पूछा, ‘क्यों जी, तुम्हारा कपड़ा किस रंग से रँगना होगा ?’ तब उस देखनेवाले ने कहा, 'भाई, तुमने जो रंग इस गमले में डाल रखा है, वही रंग मुझे दो ।' (सब हँसते हैं)
(क्रमशः)

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