शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३५७

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५७)*
*राग सूहौ ॥२२॥(गायन समय दिन ९ से १२)*
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*३५७. त्रिताल*
*काया माँही खेल पसारा, काया माँही प्राण अधारा ।*
*काया माँही अठारह भारा, काया माँही उपावनहारा ॥१॥*
*काया माँही सब वन राइ, काया माँही रहे घर छाइ ।*
*काया माँही कंदलि वास, काया माँही है कैलास ॥२॥*
*काया माँही तरुवर छाया, काया माँही पंखी माया ।*
*काया माँही आदि अनंत, काया माँही है भगवन्त ॥३॥*
*काया माँही त्रिभुवन राइ, काया माँही रहे समाइ ।*
*काया माँही चौदह भुवन, काया माँही आवागवन ॥४॥*
*काया माँही सब ब्रह्मंड, काया माँही हैं नव खण्ड ।*
*काया माँही स्वर्ग पयाल, काया माँही आप दयाल ॥५॥*
*काया माँही लोक सब, दादू दिये दिखाइ ।*
*मनसा वाचा कर्मणा, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥६॥*
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सभी साधनों में श्रेष्ठ इस शरीर पंजर में परमात्मा की लीला फैली हुई दिखती हैं । यहाँ पर मन बुद्धि आदि प्रवृत्ति मात्र के प्रति साहयक उपकरण विद्यमान है । भगवान् की माया के प्रभाव से जडवस्तु भी चेतन सी प्रतीत हो रही हैं । जैसे रज्जु में भ्रान्ति से मिथ्या सर्प प्रतीत हो रहा हैं उसी प्रकार उसकी सत्ता मात्र से मिथ्या प्रपंच भी सत्य की तरह प्रतीत हो रहा हैं ।
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अर्थात् सारा प्रपंच देह को सत्य मान कर ही हो रहा हैं । विविध तन्मात्राओं को ग्रहण करने के लिये भिन्न भिन्न इन्द्रियें इसी शरीर में रहती हैं । परमात्मा के संकेत से होने वाले समस्त कृत्यों का आश्रय भी यह देह ही हैं । मन बुद्धि के बिना यह दुरत्यय माया भी किसी को मोहित नहीं कर सकती अतः सृष्टि स्थिति विनाश रूपी क्रिया देह के अधीन हैं । ऐसा मानना चाहिये ।
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क्योंकि अधिष्ठान के बिना भ्रमविपर्यादि ज्ञान भी सम्भव नहीं हैं । भ्रम के लिये रज्जु की स्थिति आवश्यक हैं । संपूर्ण प्रकृति का पुरुष के लिये ही व्यापार एवं प्रवृत्ति देखी जाती हैं । प्रकृति जड़ होते हुए भी पुरुष के उद्धार में कारण बन जाती है । जिस प्रकार संसार में छः प्रकार के भाव विकार देखे जाते हैं । उसी तरह इस शरीर में भी जायते वर्द्धते अस्ति विपरिणाम अपक्षय और विनाश आदि विकार देखे जाते हैं ।
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जब ईश्वर व्यापार का आश्रय शरीर है तो व्यापारकर्ता ईश्वर का आश्रय भी शरीर को होने चाहिये । इसी अभिप्राय से कह रहे हैं कि काया मांही प्राण अधारा । अर्थात् सर्वेश्वर सर्वनियन्ता ईश्वर भी यहीं पर है । प्रणियों के प्राण का अवस्थान और जीवनदान करता हुआ ईश्वर विराजता हैं इसी शरीर में । वह चेतनों का चेतन सभी इन्द्रिय आदि में अपने प्रभाव से क्रिया शक्ति को प्रेरित तथा प्राणों को पुष्ट करता हुआ इस शरीर में एकरस स्थिर रहता हैं ।
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इसलिये कालीदास ने लिखा हैं कि “प्राणिनः प्राणवन्तः” प्राणों के निकलते ही मरा हुआ घोषित कर देते हैं और उसकी स्थिति में व्यवहार होता हैं । इस अन्वयव्यतिरेक के द्वारा शरीर में प्राणों का महत्व स्पष्ट हो रहा हैं । अर्थात् जो जीवनभूत प्राण है उसका भी जो प्राण स्वरूप है । अर्थात् जिसकी सत्ता से प्राणों में प्राणता है । इसके वायु रूप होने पर भी जिसके प्रभाव से वह जीवनरूप होता हैं वह ईश्वरतत्त्व है ।
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भार शब्द वनस्पति शास्त्र में प्रसिद्ध है । इसी शरीर में अठारह प्रकार के भारोंकी प्रतीति हो रही है । इससे वनस्पबनराय बतलाया है । तियों का जीवनाधाकत्व सिध होता है । अतः इस शरीर में सबका अधिष्ठान सृष्टि रचयिता चैतन्यरूप से सभी को अनुप्राणित करता हुआ इस शरीर में निवास करता है । यही पर निर्भय वन जो तपस्या का साधन है वह विराजता है । शरीर की संरचना की जो जटिलता ही वन रूपता है ।
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विविध सद्गुणरूपी साधुओं से सेवित होने से तथा कामादि दुष्टहिंसक जन्तुओं से युक्त होने के कारण ही श्रीदादूजी ने इस शरीर को ही गृह्णातीतिगृहम् इस व्युत्पत्ति के अनुसार उस चेतनरूप परमात्मा का घर भी यही है । इसका आश्रय लेकर जीवात्मा इसमें रहता है जिस तरह पर्वत कन्दराओं में महात्मा लोग तपस्या करते हैं उसी प्रकार यहां भी तप साधन के लिये मनोमय कन्दरायें हैं । जो अन्यों के द्वारा अगम्य है ।
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इस प्रकार के कन्दराओं में पवित्र मन वाले लोग तपस्या करते हैं । सब प्रकार के पंक से रहित निष्पाप एवं पवित्र शिव का धाम कैलाश भी शरीर में ही है । शून्य चक्र को ही योगीजन कैलाश कहते हैं । जिसमें स्थित शिव ज्ञान गंगा के प्रवाह द्वारा समस्त अज्ञान मालिन्य को मिटाते हैं ।
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जैसे स्वर्ग में स्थित कल्पवृक्ष की छाया में यथेच्छ पदार्थ की याचना से इष्ट फल प्राप्त करते हैं । उसी तरह इस शरीर में समस्त कामनाओं का पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है जो यथेष्ट वस्तु को प्रदान करता हैं । अतः साधक को शरीरस्थ कल्पवृक्ष से ही याचना करनी चाहिये । अन्य से याचना करने से साधक का उपहास ही होता है ।
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यहाँ पर सघन एकान्त शीतल सकल कामनाओं को पूर्ण करने वाला इश्वररुपी कल्पवृक्ष हैं और उसकी कृपा ही छाया हैं । कार्याकार्य से उत्पन्न फल का भोक्तापक्षी जीव हैं । जीवों को बांधने वाली माया भी यहीं पर ही हैं । जैसा कि द्वा सुपर्णा इस श्रुति में माया से मोहित जीव अपने अपने बन्धनों के कारण अज्ञान को नहीं देखता हुआ फल भोगता हैं । यहीं पर दृष्टा मात्र ईश्वर ही जीव के समस्त कृत्यों का अवलोकन करता हुआ साक्षिभाव से स्थित हैं ।
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इसी शरीर में आदि कारण और अन्त कार्य दोनों रहते हैं । इस देह से संपन्न कर्म ही देहांतर का कारण होता है । श्रुति प्रतिपाद्य ज्ञानार्जनरुपकर्म ही मोक्ष को देने वाला है । अतः बन्धन और मोक्ष का कारण यह शरीर ही हैं । इस शरीर में सनातन षडि्वध ऐश्वर्य संपन्न तथा सबके पालन में अप्रमत्त भगवान् रहता हैं ।
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जैसा गोपियों ने कहा है कि – आप समस्त प्राणियों के हृदय में अन्तरात्मा के रूप में दृष्टा हो । वही कभी पुरुष बनकर पालन करता हैं कभी काल बनकर सबका भक्षण करता हैं । यहीं पर अखिलभुवन का शास्ता प्रभु अष्टदलकमल पर आश्रित होकर सुखपूर्वक विश्राम करता हैं ।
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वहीँ जीवों की भावनाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों से अभिव्यक्त होता हैं । इसी शरीर में भूर्भुव स्व आदि सात ऊपरके एवं अतल वितल आदि सात नीचे के लोकों का सूक्ष्म स्थान हैं । इसी शरीर में ही जीव अपने कर्मपाश से बंधता है और उस पाश से मुक्त होता हैं । इसलिये इस ब्रह्माण्ड को वेद में अष्टचक्रा नवद्वारा अयोध्या नगरी कहा हैं ।
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पुरुष तत्त्व तो उससे भी महान् हैं परमात्मा ने अपने तेज को चौदह भुवनों में स्थापित कर रखा हैं । उसका संपूर्ण तेज शरीर में प्रकाशित हो रहा हैं । जम्बु आदि नो खण्ड उसके नौ द्वार हैं । इस संपूर्ण रहस्य को श्रीदादूजी निरावरण रूप से देख रहे हैं । जो संसार के ताप से संतप्त होकर प्रपन्न भाव से ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रियगुरु के पास जाता हैं वही इस रहस्य को जान सकता हैं । बिना गुरु के अन्य कोई भी इस रहस्य को नहीं जान सकता हैं ।
लोक निवासी काया स्थान
१. भू:              मनुष्य,              पशु नाभि
२. भुव:            भूत,                 पक्षी उर
३. स्व:            देवता                हृदय
४. मह:           ॠषि                  छाती
५. जन           सकामी भक्त     कंठ
६. तप शूर,     सती, सन्यासी    नासिका
७. सत्य ज्ञानी, सन्यासी             दशम द्वार
८. अतल        महादेव              कुक्षि
९. वितल        बाणासुर            कमर
१०. सुतल      मयनामा             जंघा
११. रसातल    शेष                   घुटने
१२. तलातल    बलि                पिंडली
१३. महातल    वासुकि नाग      टखने
१४. पाताल     कद्रू के पुत्र       पगतली
(क्रमशः)

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