🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग)*
===============
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
“भक्तिलाभ के पश्चात् संसार में रहा जा सकता है । जैसे हाथ में तेल लगाकर कटहल काटने से फिर उसका दूध हाथ में नहीं चिपकता । संसार पानी की तरह है और मनुष्य का मन जैसे दूध पानी में अगर दूध रखना चाहते हो तो दूध और पानी एक हो जायेगा; इसीलिए निर्जन स्थान में दही जमाना चाहिए । दही जमाकर मक्खन निकालना चाहिए । मक्खन निकालकर अगर पानी में रखो तो फिर वह पानी में नहीं मिलता, निर्लिप्त होकर तैरता रहता है ।
.
"ब्रह्मसमाजवालों ने मुझसे कहा था, 'महाराज, हमारा वह मत है जो राजर्षि जनक का था । हम लोग उनकी तरह निर्लिप्त रहकर संसार करेंगे ।’ मैंने कहा, 'निर्लिप्त भाव से संसार करना बड़ा कठिन है । मुँह से कहने से ही जनक राजा नहीं हो सकते । राजर्षि जनक ने सिर नीचे और पैर ऊपर करके वर्षों तपस्या की थी । तुम्हें सिर नीचे और पैर ऊपर नहीं करना होगा । परन्तु साधना करनी चाहिए, निर्जन में वास करना चाहिए । निर्जन में ज्ञान और भक्ति प्राप्त करके फिर संसार कर सकते हो । दही एकान्त में जमाया जाता है । हिलाने-डुलाने से दही नहीं जमता ।’
.
“जनक निर्लिप्त थे, इसलिए उनका एक नाम विदेह भी था - अर्थात् देह में बुद्धि नहीं रहती थी, - संसार में रहकर भी जीवन्मुक्त होकर घूमते थे । परन्तु देह-बुद्धि का नाश होना बहुत दूर की बात है । बड़ी साधना चाहिए ।
“जनक बड़े वीर थे । वे दो तलवारें चलाते थे । एक ज्ञान की दूसरी कर्म की ।
.
*श्रीरामकृष्ण तथा संन्यासाश्रम*
“अगर पूछो, 'गृहस्थाश्रम के ज्ञानी और संन्यासाश्रम के ज्ञानी में कोई अन्तर है या नहीं’, तो उसका उत्तर यह है कि दोनों वास्तव में एक ही हैं - यह भी ज्ञानी है और वह भी ज्ञानी है; परंतु इतना ही है कि संसार में गृहस्थ ज्ञानी के लिए एक भय रह जाता है । कामिनी और कांचन के भीतर रहने से ही कुछ न कुछ भय है । तुम चाहे जितने ही बुद्धिमान होओ, पर काजल की कोठरी में रहने से देह में स्याही का थोड़ासा दाग लग ही जायगा ।
.
“मक्खन निकालकर अगर नयी हण्डी में रखो तो मक्खन के नष्ट होने की सम्भावना नहीं रहती । अगर मट्ठे की हण्डी में रखो तो सन्देह होता है । (सब हँसे)
.
“धान के लावे जब भूने जाते हैं तब दो-चार भाड़ के बाहर चिकटकर गिर पड़ते हैं । वे चमेली के फूल की तरह शुभ्र होते हैं, देह में कही एक भी दाग नहीं रहता । जो लावे कड़ाही में रहते हैं, वे भी अच्छे होते हैं, परन्तु उन बाहरवालों के समान नहीं होते, देह में कुछ दाग होते हैं ।
.
संसार-त्यागी संन्यासी अगर ज्ञानलाभ करता है तो ठीक इसी चमेली के फूल की तरह बेदाग होता है; और ज्ञान के पश्चात् संसाररूपी कड़ाही में रहने पर देह में ऊपर से कुछ लाल दाग लग सकता है । (सब हँसते हैं)
.
“जनक राजा की सभा में एक भैरवी आयी हुई थी । स्त्री देखकर जनक राजा ने सिर झुका लिया । यह देखकर भैरवी ने कहा, ‘जनक ! स्त्री को देखकर अब भी तुम डरते हो !’ पूर्ण ज्ञान होने पर पाँच साल के बच्चे का स्वभाव हो जाता है, तब स्त्री और पुरुष में भेद- बुद्धि नहीं रह जाती ।
.
“कुछ भी हो, संसार में रहनेवाले ज्ञानी की देह पर दाग चाहे लग जाय, परन्तु उससे उसकी कोई हानि नहीं होती । चाँद में कलंक तो है, परन्तु उससे किरणों के निकलने में कोई रुकावट नहीं होती ।
.
“कोई कोई लोग ज्ञानलाभ के पश्चात् लोक-शिक्षा के लिए कर्म करते हैं, जैसे जनक और नारद आदि । लोक-शिक्षा के लिए शक्ति के रहने की जरूरत है । ऋषिगण अपने-ही-अपने ज्ञानोपार्जन में व्यस्त रहते थे । नारदादि आचार्य दूसरों के हित के लिए विचरण किया करते थे । वे वीर पुरुष थे ।
.
“सड़ी हुई लकड़ी जब बह जाती है, तो उस पर कोई चिड़िया के बैठने से ही वह डूब जाती है, परन्तु मोटी लकड़ी का लट्ठा जब बहता है, तब गौ, आदमी, यहाँ तक कि हाथी भी उसके ऊपर चढ़कर पार हो सकता है ।
“स्टीम बोट खुद भी पार होता है और कितने ही आदमियों को भी पार कर देता है ।
.
“नारदादि आचार्य काठ के लट्ठे की तरह हैं, स्टीम बोट की तरह ।
“कोई खाकर अँगौछे से मुँह पोंछकर बैठा रहता है कि कहीं किसी को खबर न लग जाय । (सब हंसते है) और कोई कोई अगर एक आम पाते है तो जरा जरासा सब को देते है और आप भी खाते हैं ।
“नारदादि आचार्य सब के कल्याण के लिए ज्ञानलाभ के बाद भी भक्ति लेकर रहे थे ।”
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें