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*साहिब जी सब गुण करै, सतगुरु आडा देइ ।*
*दादू तारै देखतां, निगुणा गुण नहिं लेइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निगुणा का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*रसिक मुरारिजी*
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*राज सभा सु विराज कहैं जन,*
*सोउ विवेक गहँ सु प्रभाऊ ।*
*भोज साधु करै इकठे बहु,*
*दूसर सोट१ हु द्यौ नहिं भाऊ ॥*
*पातरि डारि दिई व२ गुसांई पै,*
*गारि दिई सुन देखत दाऊ ।*
*सीत लियो नहिं देत भये मुख,*
*दूरि कर्यो भृत सेव न चाऊ ॥३५६॥*
एक दिन कई राजाओं और सज्जनों की सभा में रसिकमुरारि जी विराजे हुये भक्ति विवेकमय कथा कह रहे थे और सुनने वाले भक्त जन उसको ग्रहण कर रहे थे, क्योंकि आपका सुन्दर प्रवचन बड़ा ही प्रभावशाली होता था ।
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उसी समय सब संत इकट्ठे होकर भोजन करने के लिये विराजे हुए थे। उनमें से एक भेषधारी अपने सोंटे१ के लिये दूसरा पारस(प्रसाद की पत्तल ) मांगता था । बारंबार कहता था सोटे का पारस दो । देने वाले में सोंटे का पारस देने का भाव नहीं था अर्थात् देना नहीं चाहता था ।
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नहीं दिया तब उन भेषधारी ने कुपित होकर अपनी जूठी पत्तल थी वही२ उठाकर गोस्वामी रसिक मुरारिजी के मुख पर मार कर गालियाँ भी दीं गालियाँ सुनकर तथा समय देखकर रसिक मुरारिजी बोले-देखो, संत की कृपा से मेरा कैसा अच्छा दाव लग गया है । मैं संतों का केवल चरणामृत ही लेता था ।
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संतों की सीत(उच्छिष्ट) प्रसादी से तो विमुख ही था । इन संत जी ने लाकर मुख में डाल ही दिया है । यह बड़ी कृपा की है । यह कहकर उस संत को सोंटे का और उसका भी दो पारस दिलाये । जिसने सोंटे की पत्तल नहीं दी थी उसको यह कहकर कि तुम्हारे में सेवा करने का उत्साह तथा प्रेम नहीं है, सेवा कार्य से हटा दिया और कहा- "तुमने सोंटे की पत्तल क्यों नहीं दी ! इस सोंटे से भांग घोट कर और पीकर सन्त तीन पारस उड़ा जाते हैं"
(क्रमशः)

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