शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १७२*

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*प्राण कवल मुख राम कहि,*
*मन पवना मुख राम ।*
*दादू सुरति मुख राम कहि,*
*ब्रह्म शून्य निज ठाम ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७२ भक्ति प्रेरणा । एक ताल
भक्ति कर लेहु प्राण पति लाल१,
ऐसे समझि देखि उर अंतरि, और सकल तज ख्याल ॥टेक॥
जिन जिन भक्ति करी केशव की, ते सब भये निहाल२ ।
मन वच कर्म मान मन ऐसे, नाम निकट गोपाल ॥१॥
नाम नेह केते पति परसे३, तोरि सकल जंजाल ।
ऐसे जान वाणि रट रज्जब, संत मिलें इस चाल ॥२॥३॥
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प्रभु की भक्ति करने की प्रेरणा कर रहे हैं -
✦ प्यारे१ प्राणपति प्रभु की भक्ति करके प्रभु को प्राप्त करले । अपने हृदय में सब संसार को खेल रूप देखकर त्याग दे और ऐसे समझ कि - भक्ति ही मुझे कर्तव्य है ।
✦ जिन जिन ने भगवान केशव की भक्ति करी है, वे सब कृतार्थ२ हो गये हैं । हम मन वचन कर्म से यथार्थ ही कहते हैं, तू अपने मन में ऐसे मानकर रट, कि नाम चिन्तन से गोपाल भगवान अति निकट हृदय में ही प्राप्त हो जाते हैं ।
✦ नाम चिन्तन में प्रेम करके कितने ही भक्त जन संपूर्ण जगत जाल को तोड़कर प्रभु से जा मिले३ हैं । ऐसे जानकर वाणी से निरंतर नाम रट, संत जन इसी चाल द्वारा प्रभु से मिले हैं ।
(क्रमशः)

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