शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३५४

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५४)*
*राग सूहौ ॥२२॥(गायन समय दिन ९ से १२)*
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*३५४. विनती । एकताल*
*तुम बिच अंतर जनि परै, माधव ! भावै तन धन लेहु ।*
*भावै स्वर्ग नरक रसातल, भावै करवत देहु ॥टेक॥*
*भावै विपति देहु दुख संकट, भावै संपति सुख शरीर ।*
*भावै घर वन राव रंक कर, भावै सागर तीर, माधव ॥१॥*
*भावै बँध मुक्त कर, माधव ! भावै त्रिभुवन सार ।*
*भावै सकल दोष धर माधव, भावै सकल निवार,माधव ॥२॥*
*भावै धरणि गगन धर, माधव ! भावै शीतल सूर ।*
*दादू निकटि सदा संग, माधव ! तूँ जनि होवै दूर, माधव ॥३॥*
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हे माधव ! चाहे आप हमारा तन धन आदि सर्वस्व हरण कर ले, किन्तु आपके और मेरे बीच में थोड़ा सा भी अन्तराल नहीं होना चाहिये । अर्थात् आपके दर्शन सदा होते रहें । मेरे को आप स्वर्ग नरक पाताल में पटक दें, मेरा शिर कटवा दें, यथेच्छ विपत्ति तथा शारीरिक मानसिक कष्ट प्रदान करें । अथवा शारीरिक मानसिक सुख देवें । घर या वन में निवास दें । राजा रंक बना दें । 
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समुद्र के किनारे पर रखें । बंधन या मुक्ति प्रदान करें । त्रिभुवन का वैभव प्रदान करें । चाहे मेरे हृदय में सारे दोष आ जांवे । पृथ्वी आकाश में कहीं पर भी रखें । शीतल रखो या सूर्य के समान उष्ण बना दो । हे माधव ! आप कुछ भी करें मैं सब कुछ सहन कर लूंगा, लेकिन आपका वियोग कभी नहीं सहन कर सकूंगा । आप मेरे से दूर न जावें, पास ही सदा रहें यही मेरी आपसे प्रार्थना हैं । 
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श्रीमद्भागवत में कहा है कि –
हे तात ! तुम्हारी तरह जो लोग श्रीमुकुन्द पादारविन्द के ही मधुकर हैं जो निरन्तर प्रभु की चरणरज का सेवन करते हैं और जिनका मन अपने आप प्राप्त हुई सभी परिस्थितियों से संतुष्ट रहता है वे भगवान् से उनकी सेवा के सिवा अपने लिये और कोई भी पदार्थ नहीं मांगते ।
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हे जगद्गुरो ! हमारे जीवन में सदा पद पद पर विपत्तियां आती रहें क्योंकि विपत्तियों में निश्चितरूप से आपके दर्शन होते रहते हैं । जिस से जन्म मरण के चक्कर में नहीं जाना पड़ता । हे नाथ ! चाहे मुझे हजारों योनियों में जाना पड़े तो कोई आपत्ति नहीं है । परन्तु उन उन योनियों में आपकी मुझे अचल भक्ति प्राप्त होनी चाहिये ।
(क्रमशः) 

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