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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू केते चल गये, थाके बहुत सुजान ।*
*बातों नाम न नीकले, दादू सब हैरान ॥*
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*हैरान कौ अंग ॥*
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तिरि तेरू थाके सबै, लहै न कोई पार ।
बषनां बेहदि हदि नहीं, बेकीमति करतार ॥१॥
समस्त तैरने वाले तैर-तैर कर थक गये किन्तु किसी ने भी अपार समुद्र का दूसरा छोर नहीं पाया । वह हदहीन, निस्सीम है । बषनांजी कहते हैं, इसी प्रकार वेद, पुराण, कुरान आदि ग्रंथों के स्वाध्यायी, कथाकार, पंडित, वक्ता, मौलवी उस परब्रह्म-परमात्मा को खोजते-खोजते थक गये किन्तु उन्हें बेकीमती=अमूल्य=भक्ति द्वारा प्राप्त करतार=परमात्मा का कुछ भी अनुभव नहीं हुआ क्योंकि वह परमात्मा कर्म-ग्रंथादि द्वारा प्राप्त न होकर भाव-भक्ति साध्य है । यही परमात्मा का हदहीन होते हुए निस्सीम होना है ॥१॥
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बषनां बेद कतेबौं कागदौं, लिख्याँ न आवै ग्यानि ।
पंषी उड्या अकास मैं, सब अपणैं उनमानि ॥२॥
बषनांजी कहते हैं, वेद और कतेब=कुरान का वास्तविक ज्ञान कागजों पर लिखने से हृदयंगम नहीं होता । इनमें निहीत ज्ञान तबही हृदयंगम होता है जब उसका अनुभव किया जाये । शास्त्रज्ञ कहता है, “समस्त संसार के समस्त जड़ पदार्थ व चेतन जीव मेरे ही स्वरूप हैं, मेरे अतिरिक्त अन्य किसी की कोई सत्ता ही नहीं है ।”
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किन्तु इसको पढ़ने वाला शास्त्रज्ञ पंडित क्रोध आने पर दूसरे व्यक्ति को लाठियों से मारता है तो उसका यह ज्ञान व्यर्थ है क्योंकि इस ज्ञान के अनुसार प्रथम तो पंडित को क्रोध ही न आना चाहिये क्योंकि क्रोध तो तब किया जाता है तब दूसरे की सत्ता हो किन्तु पंडित ने इस ज्ञान को पढ़ा मात्र है, अनुभव नहीं किया है ।
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इसलिये उसे अभी तक दूसरे की सत्ता भासती है और इसी कारण उसे क्रोध आया है । वेदान्त में ज्ञान दो प्रकार का माना गया है एक परोक्ष दूसरा अपरोक्ष । शास्त्रीयज्ञान परोक्ष तथा आत्मानुभव अपरोक्ष(प्रत्यक्ष) ज्ञान है । बषनांजी परोक्ष ज्ञान को अग्राह्य बताकर अपरोक्ष ज्ञान को ग्रहण करने की बात करते हैं ।
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बषनांजी उदारहण द्वारा परोक्ष को अग्राह्य बताते हुए कहते हैं जिस प्रकार अनंत विस्तार वाले आकाश में पक्षी अपनी-अपनी उनमानि=सामर्थ्य के अनुसार उड़ते हैं लेकिन कोई भी उस अनंत आकाश का अन्तिम छोर नहीं पा पाते । ऐसे ही वेद, कुरान का ज्ञान आत्मतत्त्व को खोजने=बताने का तो प्रयत्न करते है किन्तु पूरा नहीं बता पाते और अंत में नेति नेति कह कर मौन धारण कर लेते हैं ।
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अतः इनमें व्यर्थ अधिक समय गँवाने की अपेक्षा परमात्मा को भजन-स्मरण के द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥२॥
इति हैरान कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ३७॥साषी ५८॥
(क्रमशः)

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