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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५९)*
*राग सूहौ ॥२२॥(गायन समय दिन ९ से १२)*
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*३५९. रंगताल*
*काया माँही विषमी बाट, काया माँही औघट घाट ।*
*काया माँही पट्टण गाँव, काया माँही उत्तम ठाँव ॥१॥*
*काया माँही मण्डप छाजै, काया माँही आप विराजै ।*
*काया माँही महल आवास, काया माँही निश्चल बास ॥२॥*
*काया माँही राजद्वार, काया माँही बोलणहार ।*
*काया माँही भरे भण्डार, काया माँही वस्तु अपार ॥३॥*
*काया माँही नौ निधि होइ, काया माँही अठ सिधि सोइ ।*
*काया माँही हीरा साल, काया माँही निपजैं लाल ॥४॥*
*काया माँही माणिक भरे, काया माँही ले ले धरे ।*
*काया माँही रत्न अमोल, काया माँही मोल न तोल ॥५॥*
*काया माँही कर्तार है, सो निधि जानै नाँहिं ।*
*दादू गुरुमुख पाइये, सब कुछ काया मांहि ॥६॥*
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जैसे लोक में बद्रिकाश्रम में जाने वाला मार्ग अति कठिन है क्योंकि रास्ते में बड़ी-बड़ी नदियों के आने से तीर्थयात्रियों को दुष्कर मालूम पड़ता हैं । ऐसे ही शरीर में काम, क्रोध आदि दुर्गम घाटियें हैं इनको पार किये बिना ब्रह्मप्राप्ति दुर्लभ हैं ।
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जैसे संसार में विविध मार्ग आदि वस्तुओं से संपन्न पटना नगर हैं ऐसे शरीर भी एक पाटलिपुत्र नगर हैं । वह अलौकिक शमदमतितिक्षा आदि संपत्तियों से संपन्न होने के कारण सबसे अधिक सुन्दर हैं । जिसमें प्रभुप्राप्ति द्वारा दुर्लभ मुक्ति आदि भी प्राप्त हो जाते हैं ।
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इसी शरीर में जहां जाकर वापस नहीं लौटते वह परमात्मा का परमधाम हैं । जो सत्पुरुषों से सेवित उत्तम स्थान हैं । उस स्थान में हृदय के मध्य अष्टदलकमल सुशोभित हो रहा है । जहां सकल कल्याणगुणनिधि भगवान् विराजते हैं । मानो सद्भावनाओं का बना हुआ मण्डप हैं । जिसके नीचे परमात्मा विराजते हैं । यहीं पर चित्त की ब्रह्माकार वृतियों का तथा विविध संकल्प विकल्प का स्थान हैं ।
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जैसे लोक में राजद्वार में या अन्तःपुर में जाने का राजमार्ग होता हैं वैसे ही यहाँ परब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिये ब्रह्मरन्ध्र नामक द्वार हैं । जैसे ब्रह्माण्ड में सुन्दर भवन हैं । वैसे ही शरीर में अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय आनन्दमय ये पांच महल हैं, ब्रह्माण्ड में जैसे कल्याण के लिये काशी वास रखते हैं वैसे ही काया में ब्रह्म की वृत्ति की स्थिरतारूप ही निश्चल वस् हैं । जीवों की इन्द्रियों को चेतनता शक्ति प्रदान करने में लिये इस शरीर में भगवान् विराजते हैं ।
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वह इन्द्रियों को चेतन करता हुआ वाणी को भी पीड़ित करता है । इसी में संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान कला आदि का भण्डार सुशोभित हो रहा है । किन्तु उद्भावक के बिना ज्ञान-विज्ञान के भण्डार अज्ञान से आच्छादित हो रहे हैं । क्योंकि अज्ञान ज्ञान-विज्ञान का अवरोधक है । जैसे ब्रहमाण्ड में अनन्त वस्तुयें हैं, वैसे शरीर में दिव्यगुण आसुरी सम्पत् सात धातुयें आदि अनन्त वस्तु निवास करती हैं ।
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अष्ट सिद्धि नव निधि इसी में हैं । अर्थात् योगसाधनों से जन्य अणिमादि अष्टसिद्धियाँ हृदय में रहती हैं । वैसे ही पद्म, महापद्म आदि नवनिधियाँ भी शरीर में ही हैं । योग जन्य साधन द्वारा कुण्डली का उद्बोध नहीं होने से उनकी साक्षात् प्रतीति नहीं हो रही । ऐसा योगी लोग कहते हैं – श्रवण, कीर्तन, पादसेवन, अर्चना, बन्दना, दास्यभाव, सख्यभाव, आत्मनिवेदन यह नवधाभक्ति ही यहाँ पर नव निधियाँ हैं ।
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लोक में अणिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व ये अष्टसिद्धियाँ है वैसे ही शरीर में मन, बुद्धि, चित्त, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ – ये ही अष्ट सिद्धियाँ हैं । जैसे सर्वज्ञता दूरश्रवण परकाय प्रवेश वाक्सिद्धि कल्पवृक्षत्व(सृजनशक्ति), संहारशक्ति, ईशिता, अमृत्व, सर्वांगत्व यह दस सिद्धियाँ योग में प्रसिद्ध है । वैसे ही शरीर में इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गंधारी, हस्ति, जिव्हा, उषा, यशस्विनी, अलंबुषा, कूहू शंखिनी ये दस नाडियाँ ही दस सिद्धियाँ हैं ।
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इनके क्रमशः स्थान –
वामनासिका, दक्षिणनासिका इन दोनों के मध्य का भाग, वाम तथा दक्षिण नेत्र कर्ण और वामकर्ण, लिंग गुदा ये दस स्थान हैं । अभ्यास द्वारा इनको सिद्धि देने का कारण होने से सिद्धिपद से कहा जाता हैं ।
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लोक में जैसे पारसमणि, मुक्तामणि आदि साधन से जन्य सर्वशोकहरण करना वाली हैं वैसे ही शरीर में विचाररूपी हीरा आदि बुद्धि में रहते हैं । लोक में खान से हीरा निकलता है वैसे ही शरीर में भजन के द्वारा मन और इन्द्रियों की एकाग्रता रूपी लाल प्राप्त होता हैं ।
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अर्थात् जब इन्द्रियों का समुदाय विषयों को त्यागकर प्रभुपरायण होता हैं तब ये इन्द्रियाँ लाल तुल्य अमूल्य हो जाती हैं । जैसे जौहरियों के घर अमूल्य माणिक्यादि से भरे रहते हैं वैसे ही यह शरीर भी श्वास प्रश्वास रूप माणिक्य से परिपूर्ण हैं ।
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लोक में लोग अपने-अपने घरों को बाह्यपदार्थों से भरते हैं वैसे साधक सन्त भी सद्विचारों से अपनी बुद्धिरूपी घर को भरते हैं । जैसे समुद्रमन्थन से चौदह रत्न निकले वैसे ही मन के मन्थन से शम, दम, यम, नियम, निदिध्यासन, आदि रत्नरूप तत्त्व इसीमें प्राप्त होते हैं । ये रत्न तपजन्य होने से अमूल्य हैं और अलौकिक होने से नित्य सौन्दर्यसंपन्न हैं । सब रत्नों में श्रेष्ठ रत्न जो भगवान् हैं वह भी इसी शरीर में स्थित रहता हैं ।
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उस प्रभु के दर्शन जब ही हो सकते हैं कि जब सद्गुरु प्रसन्न होकर कराना चाहे, जिस सदगुरु ने परमात्मा का मार्ग देखा हो वह जब प्रसन्न हो तब ही इसी शरीर में ब्रह्मतत्त्व का साक्षात् कराकर उसको विविध भ्रमजन्य अज्ञान से मुक्त करा देता हैं । यह जीवात्मा सकल सुखनिदान उस परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को न जानकर ही जन्म-मृत्यु के क्लेशों को प्राप्त हो रहा है । अतः सद्गुरु द्वारा इसी शरीर में उस ब्रह्मतत्त्व को खोजना चाहिये ।
(क्रमशः)

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