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*सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै कोइ ।*
*दादू साधु सब कहैं, भला कहाँ तैं होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निगुणा का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*आयसु से अचवन्न लियो उन,*
*दुष्टन में मुखि१ ताप२ हि आये ।*
*माग मिले सचिवै शिष बोलत,*
*प्रात पधारहु नीच बताये ॥*
*काम करे हम सो समझावत,*
*आत नहीं मन नेह डराये ।*
*चिंत करो जनि धीर धरो उर,*
*भूप कहा दिन तीन लगाये ॥३५९॥*
फिर गुरुआज्ञा से आचमन किया, मुख और हाथ धोये । गुरु जी ने आपको समर्थ जान कर, उसे दुष्ट जनों में मुख्य१ और दुःख२ देने वाले राजा के पास भेजा । जहाँ वह राजा था वहाँ रसिक मुरारिजी आये ।
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उस राजा के कायस्थ मंत्री लोग आपके शिष्य थे । वे सब मार्ग में आकर आपसे मिले और बोले— "राजा नीच स्वभाव है, राजा की नीचता बताकर कहा- "आप प्रातः काल यहाँ से चले जाइये और आपके प्रतिनिधि रूप में आप हम को भेजिये ।
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हम उसको समझा कर सब कार्य सुधार लेंगे ।" उन लोगों का कहना आपके मन में ठीक नहीं आया अर्थात् उचित नहीं समझा । आपने जाना कि ये लोग हमारे स्नेह से डरते हैं ।
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फिर शिष्यों को आपने समझाया कि- "तुम लोग चिन्ता मत करो हृदय में धैर्य धारण करो और जाकर हमारे आगमन की सूचना राजा को दी ।" उक्त शिष्य लोग तीन दिन तक आपके पास रहे । राजा ने इनको बुलाकर पूछा- "तुम तीन दिन तक कहाँ रहे ?" इन लोगों ने कहा- हमारे गुरु जी पधारे हैं, उनके पास रहे हैं ॥
(क्रमशः)

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