गुरुवार, 27 जुलाई 2023

*३९. बिनती कौ अंग १/४*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३९. बिनती कौ अंग १/४*
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पांउ पड़यौ४ बिनती करौं, प्रकटॏं ह्रिदै मुरारि ।
कहि जगजीवन रांमजी, तुम पुरिष हम नारि ॥१॥
(४. पांउ पड़यौ=श्रीचरणों में झुका हुआ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु मैं आपके पांव पड़कर विनती करता हूँ कि आप मेरे ह्रदय में प्रकट होवें । संत कहते हैं कि आप पुरुष हैं और हम आत्मा नारी हैं ।
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मिलहु तो मंगल गाइये, महरवान करि मिहर ।
कहि जगजीवन प्रगटिये, जगजीवन इहिं सहर५ ॥२॥
(५. सहर=प्रातःकाल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे कृपालु कृपा कीजिए कि हम मिलकर मंगल गान गायें । और आप हमारे जीवन प्रभात में ही प्रकट होकर हम पर कृपा करें ।
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हा हा हा हा रांमजी, हेत करौ हरि आइ ।
कहि जगजीवन क्रिपा तुम्हारी, विपति हमारी जाइ ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि निश्चय ही आप दया करके आइए आपके कृपा कर आने से हमारे संकट दूर हो जायेंगे ।
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हा हा हरि बिनती करौं, सुनौ सनेही रांम ।
कहि जगजीवन दीन कौं, दरसन दीजै नांम ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु आप हमारी व्यथा सुनें हम विनती करते हैं आप मुझ गरीब को दर्शन देकर नाम स्मरण क्षमता भी प्रदान करें ।
(क्रमशः)

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