बुधवार, 26 जुलाई 2023

नाहं नाहं नाहं

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू हूँ की ठाहर है कहो, तन की ठाहर तूं ।*
*री की ठाहर जी कहो, ज्ञान गुरु का यूं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"गौ 'हम्बा'(हम-हम) करती है, इसलिए उसे इतना दुःख मिलता है । बैल को दिन भर हल जोतना पड़ता है - गरमी हो या वर्षा । और फिर उसे कसाई काटते हैं । इतने पर भी बचाव नहीं होता, चमार चमड़े से जूते बनाते हैं । अन्त में आँत की ताँत बनती है । धुनिया के हाथ में जब वह ‘तूँ’ ‘तूँ’ करती है, तब कहीं उसका निस्तार होता है ।
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“जब जीव कहता है, "नाहं नाहं नाहं, हे ईश्वर, मैं कुछ भी नहीं हूँ, तुम्हीं कर्ता हो; मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो', तब उसका निस्तार होता है, तभी उसकी मुक्ति होती है ।”
डाक्टर - परन्तु धुनिये के हाथ में पड़े तब तो ! (सब हँसते हैं)
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श्रीरामकृष्ण - जब 'मैं' जाने का है ही नहीं, तो पड़ा रहे दास 'मैं' बना हुआ ! (सब हँसते हैं)
“समाधि के बाद भी किसी किसी का 'मैं' रह जाता है - 'दास मैं', 'भक्त का मैं’ । शंकराचार्य ने लोकशिक्षा के लिए ‘विद्या का मैं’ रख छोड़ा था । 'दास मैं, विद्या का मैं, भक्त का मैं' यह पक्का 'मैं' है ।
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"कच्चा ‘मैं’ क्या है, जानते हो ? मैं कर्ता हूँ, मैं इतने बड़े आदमी का लड़का हूँ, विद्वान् हूँ, धनवान हूँ, मुझे ऐसी बात कही जाय ! - ये सब कच्चे 'मैं' के भाव है । अगर कोई घर में चोरी करे और उसे अगर कोई पकड़ ले, तो पहले सब चीजें उससे छुड़ा लेता है, फिर मार-पीटकर उसे सीधा कर देता है, फिर पुलिस को सौंप देता है । कहता है, ‘हँ, नहीं जानता किसके घर में चोरी की !’
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“ईश्वर-प्राप्ति होने पर पाँच वर्ष के बच्चे जैसा स्वभाव हो जाता है । 'बालक का मैं' और 'पक्का मैं' । बालक किसी गुण के वश नहीं है । वह तीनों गुणों से परे है । सत्त्व, रज और तम में से किसी गुण के वश नहीं । देखो, बच्चा तमोगुण के वश में नहीं है ।
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अभी तो उसने लड़ाई की और देखते ही देखते फिर गले से लिपट गया । कितना प्रेम और कितना खेल ! वह रजोगुण के भी वश में नहीं है । अभी उसने घरौंदा बनाया, कितनी मेहनत की, पर कुछ देर में सब पड़ा रह गया ! वह माता के पास दौड़ चला । कभी देखो तो एक सुन्दर धोती पहने हुए घूम रहा है, पर कुछ देर बाद देखो तो वह कपड़ा खुलकर गिर गया है । कभी देखो, वह कपड़े की बात ही बिलकुल भूल गया है या उसे बगल में ही दबाये घूम रहा है । (हास्य)
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“अगर बच्चे से कहो, 'यह बड़ी अच्छी धोती है, यह किसकी धोती है ?' तो वह कहेगा, 'यह मेरी धोती है - मेरे बाबूजी ले आये हैं ।' अगर कहो, 'वाह, बच्चू, तू बड़ा अच्छा है, बच्चू, मुझे यह धोती दे दे' तो वह कहेगा - 'नहीं, मेरी धोती है, मेरे बाबूजी की दी हुई है । उँहूँ, मैं न दूँगा ।' फिर उसे एक खिलौने पर या एक बाजे पर फुसला लो - वह पाँच रुपये की धोती तुम्हें देकर चला जायगा ।
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पाँच वर्ष का बच्चा सत्वगुण के भी वश में नहीं है, पड़ोस के बच्चों से कितना प्यार है, बिना देखे रहा नहीं जाता, परन्तु माँ- बाप के साथ अगर किसी दूसरी जगह चला गया तो वहाँ नये साथी मिल जाते हैं, उन्हीं पर सब प्यार हो जाता है, पुराने साथियों को एक प्रकार से एकदम भूल जाता है ।
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बच्चे को फिर जाति आदि का अभिमान भी नहीं होता । माता ने कह दिया है कि वह तेरा दादा है, बस उसे पूरा विश्वास हो गया कि यह मेरा दादा है । चाहे एक ब्राह्मण का लड़का हो और दूसरा कुम्हार का, दोनों एक ही पत्तल पर खा सकते हैं । बच्चे में शुचिता और अशुचिता का भी विचार नहीं है, न लोक-लज्जा ही है ।
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“और ‘वृद्ध का मैं’ भी है । (डाक्टर हँसते हैं) वृद्ध के बहुत से पाश हैं, - जाति, अभिमान लज्जा, घृणा, भय, विषय-बुद्धि, पटवारी-बुद्धि, कपटाचरण । अगर किसी से वह नाराज हो जाता है तो सहज ही उसका रंज नहीं मिटता । सम्भव है, जीवन भर के लिए वह कसकता रहे । तिसपर पाण्डित्य का अहंकार और धन का अहंकार भी है । 'वृद्ध का मैं' कच्चा 'मैं' है ।
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(डाक्टर से) “चार-पाँच आदमी ऐसे हैं जिन्हें ज्ञान नहीं होता । जिसे विद्या का अहंकार है, जिसे धन का अहंकार है, पाण्डित्य का अहंकार है, उसे ज्ञान नहीं होता । इस तरह के आदमियों से अगर कहा जाय, 'वहाँ एक बहुत अच्छे महात्मा आये हैं, दर्शन करने चलोगे ?’ - तो कितने ही बहाने करके कहता है, ‘न: मैं न जाऊँगा ।’ और मन ही मन कहता है, 'मैं इतना बड़ा आदमी हूँ, मैं क्यों जाऊँ ?'
(क्रमशः)

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