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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*संझ्या चलै उतावला, बटाऊ वन-खंड मांहि ।*
*बरियां नांहीं ढील की, दादू बेगि घर जांहि ॥*
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*लै कौ अंग ॥*
कौड़ी रमताँ डाबड़ौ, डरतौ सास न लेइ ।
बषनां साहिब तौ मिलै, यौं लै चरणाँ देइ ॥१॥
डाबड़ौ = बालक कौडी से रमताँ = खेलते समय, कौड़ियों को फैंकते समय माता-पिता आदि से डर के कारण तनिक सी भी, सास न लेइ = आवाज नहीं करता । उसे डर रहता है कि यदि माता-पिता आदि ने मुझे खेलते हुए देख लिया तो वे मुझसे कौड़ी छीन लेंगे और मुझे खेल से हाथ धोना पड़ेगा । कहने का आशय यह है कि यद्यपि बालक शरीर से कौडियों से खेल रहा है किन्तु उसका ध्यान माता-पिता आदि में है । यौं = इसी प्रकार यदि साधक अपनी लै = चित्तवृत्ति को, संसार में वर्तते हुए भी परमात्मा में लगा दे तो बषनांजी कहते हैं, उसे साहिब = परमात्मा की प्राप्ति निःसंदिग्ध रूप से हो जाती है । “तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पित मनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥१॥”
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कोसा चौसर लैंण नैं, बषनां जल अमिन जाइ ।
बिलब न लावै डरपतौ, देखत सीझै आइ ॥२॥
कोसा = गोताखोर, चौसर = मुक्ता-मण्यादि खोजने के लिये सरोवरादि के जल में डुबकी लगाता है । वह उस जल में बिलंब = अधिक समय तक नहीं रुकता क्योंकि उसे डर रहता है कि यदि मैं अधिक समय तक जल में रुक गया और वहाँ श्वास लेना पड़ गया तो श्वास के साथ पेट में जल प्रविष्ट हो जायेगा और मैं मर जाऊंगा । यहाँ यह बात सिद्ध हुई कि यद्यपि गोताखोर शरीर से मुक्ता-मण्यादि की खोज करता है किन्तु उसकी चित्तवृत्ति जल्दी से जल्दी बाहर निकलने में लगी रहती है । इसी प्रकार यदि संसार में रहने वाला आत्मजिज्ञासु संसार में देखत = मात्र दृष्टा बनकर वर्ते तो उसका लक्ष्य तत्काल सीझै = सिद्ध हो जाता है, प्राप्त हो जाता है ॥२॥
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यौ लै लावै राम स्यूँ, बषनां सारौ काम ।
अवार हुवाँ पंथी डरै, कब घर जास्यूँ राम ॥३॥
बषनांजी कहते हैं, सारौ काम = समस्त कार्यों को निष्काम = अकर्ता भाव से करते हुए यौ = जो रामजी में अपनी चित्तवृत्ति को अहर्निश लगाकर रखता है उसको निःसंदेह रामजी की प्राप्ति हो जाती है, स्वात्मतत्त्व का बोध हो जाता है । उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हुए कहते हैं, जिस प्रकार राह में चलते राहगीर को देरी हो जाने पर, घर कब पहुचूंगा, देर बहुत हो गई है” का ही चिंतन करता है । उसी प्रकार साधक को वर्तना तो संसार में पड़ता है किन्तु चिंतन सदैव परब्रह्म-परमात्मा का करना चाहिये ॥३॥
इति लै कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ३८॥साषी ६१॥
(क्रमशः)

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