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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३६०)*
*राग सूहौ ॥२२॥(गायन समय दिन ९ से १२)*
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*३६०. वर्णभिन्न ताल*
*काया माँही सब कुछ जाण, काया मांहै लेहु पिछाण ।*
*काया माँही बहु विस्तार, काया माँही अनन्त अपार ॥१॥*
*काया माँही अगम अगाध, काया माँही निपजे साध ।*
*काया माँही कह्या न जाइ, काया माँही रहे ल्यौ लाइ ॥२॥*
*काया माँही साधन सार, काया माँही करे विचार ।*
*काया माँही अमृत वाणी, काया माँही सारंग प्राणी ॥३॥*
*काया माँही खेलै प्राण, काया माँही पद निर्वाण ।*
*काया माँही मूल गह रहै, काया मांही सब कुछ लहै ॥४॥*
*काया माँही निज निरधार, काया माँही अपरम्पार ।*
*काया माँही सेवा करै, काया माँही नीझर झरै ॥५॥*
*काया माँही वास कर, रहै निरंतर छाइ ।*
*दादू पाया आदि घर, सद्गुरु दिया दिखाइ ॥६॥*
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जो जो भी वैध्य वस्तु है इस जगत् में वह इस काया में भी है । अतः अपने अनुभव से सब को जान लेना चाहिये । मन के संकल्प विकल्पों का विस्तार भी इसी शरीर में होता हैं । जो अपार अगम्य परमात्मा है वह भी इसी शरीर में जाना जाता हैं । जो प्रभु इन्द्रियों के अविषय सब का आश्रय सबको व्याप्त करके रहने वाला हैं । वह इसी शरीर में रहता हैं ।
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सद्भावनाओं का जो एकमात्र साधुत्व हैं वह भी इसीमें सुशोभित होता हैं । अनिर्वाच्य ब्रह्म तत्त्व भी इसी शरीर में रहता हुआ सुशोभित होता हैं । महात्मा लोग भी इस शरीरस्थ ब्रह्म को जान कर ही बाह्य विषयों से उपराम को प्राप्त हो जाते हैं । अर्थात् अपनी निश्चल मनोवृत्ति को बनाकर कृतकृत्य हो जाते हैं । यह शरीर ही ब्रह्म प्राप्ति में सबसे प्रधान साधन हैं । यह शरीर ही धर्म का मुख्य साधन हैं ।
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जीवात्मा इस शरीर को प्राप्त करे ही भव सागर से पार हो सकता हैं । अन्यथा नहीं । इसकी सत्ता में ही धार्मिक कृत्य और ब्रह्म ज्ञान को पैदा करने वाले अनुभव पैदा होते हैं । अतः यह मोक्ष का द्वार हैं । इस शरीर को प्राप्त करके भी यदि परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता तो वह फिर पश्चाताप करता हैं और आत्मा कहलाता हैं ।
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ब्रह्म सम्बन्धी नाना चिन्तन इसी शरीर में ही हो सकते हैं । जिस चिन्तन से अभेद ज्ञान प्राप्त करके अपनी हृदयग्रंथि(अहंकार) को नष्ट कर देता हैं । ओंकार स्वरूप वेद के प्राणरूप को परा वाक् हैं वह भी इसी में पैदा होती हैं । जिस परावाक् से साधक तद् वाच्यत्वेन स्थित ब्रह्म को जान जाता हैं ।
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इस शरीर में शारंगपाणी श्रीहरि भी निवास करते हैं । शारंगपाणी इस विशेषण से यह बतलाता कि भगवान् कामक्रोधादिकों के हरण में तथा भक्तों के क्लेशों को नष्ट करने में सदा सावधान रहते हैं । यह भाव हैं । इसी शरीर में पञ्चभूत प्राणों की क्रीड़ा हो रही हैं अथवा इसी शरीर में सन्तजन परमेश्वर के साथ आनन्द का अनुभवरूप खेल खेलते हैं । इसी में भगवान् का परमधाम प्राप्त किया जाता हैं ।
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जिसको प्राप्त करने के बाद उससे अधिक लाभ की इच्छा ही पैदा नहीं होती । इसके पवित्र होने पर सब पवित्र हो जाते हैं । इस शरीर के रहस्य को जान लेने के बाद सब कुछ सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम वेद्य पदार्थ को साधक जान लेता है । परात्पर जो जीवों का आत्मस्वरूप ब्रह्म है उसका शुद्ध अन्तःकरण से मन के द्वारा सेवा करके उसको प्रसन्न करना चाहिये । इस काया में ही तालुमूल से अमृत झरता हैं ।
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श्रुति में कहा है कि –
हे वरुण ! तुम सुदेव हो तुम्हारे काकु से सात नदियां बहती रहती हैं । काकुर्यस्मिन्विद्यते इस व्युत्पत्ति से काकु नाम तालु का हैं उससे दिन रात अमृत स्वरूप सात नदियाँ बहती हैं । अतः ब्रह्म में अनुरक्त होकर सतत चित्त की ब्रह्माकार वृत्ति के द्वारा ब्रह्म के अनुभव में लगे रहो ।
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इस तरह उपदेश का उपसंहार करते हुए श्रीदादूजी महाराज कह रहे हैं – कि जीवों का प्राप्तव्य घर यही हैं और हम सबको वहीँ पर जाना हैं दूसरी जगह नहीं । परमगुरु की अनुकम्पा से ही मैंने इस रहस्य को जाना हैं । जब तक गुरु की दया नहीं होती तब तक इस कल्याणकारी रहस्य को कोई नहीं जान सकता ।
(क्रमशः)

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