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*दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण ।*
*शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*आत भये गुरु ल्याव कह्यो वर,*
*देत करामत येह सुनाई ।*
*जाहु अभी उन मानुष देखहि,*
*जोर चले गज धूम मचाई ॥*
*भाज कहार गये नहिं देखते,*
*बोलि कहा सु गिरा सुध भाई ।*
*कृष्ण ही कृष्ण कहो तम छाड़ हुं,*
*प्रेम सन्यो सुन देह नवाई ॥३६०॥*
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दुष्ट राजा ने मंत्रियों से यह सुनकर कि - "हमारे गुरु जी पधारे हैं ।" कहा- "उनको हमारे यहाँ लाओ । हम उनकी करामत देखें, तब उनको श्रेष्ठ जानकर गाँव देंगे ।" राजा ने जब यह बात सुनाई तब भी आपके शिष्यों ने प्रार्थना की कि - "स्वामीजी आप अब भी स्थान को पधार जाइये ।"
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आपने उनको कहा- "चलो उस मनुष्य को देखते हैं, वह क्या कहता है और क्या करता है ।" ऐसा कहकर पालकी जोड़ कर तथा उस पर बैठकर सुखपूर्वक चले ।
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उधर उस दुष्ट राजा ने एक मनुष्यों को मारने वाला मतवाला हाथी रसिक मुरारीजी के सामने छुड़वा दिया । उसने खूब धूम मचाई । उसे देखकर सब कहार पालकी छोड़कर भाग गये । वे तो हाथी की ओर देख भी नहीं सके ।
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आपने सुन्दर और शुद्ध वाणी बोलते हुए हाथी को कहा- "हे भाई ! तुम हाथी के शरीर के तमोगुण को त्याग कर श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण कहो ।" आपका प्रेम से मिला हुआ उपदेश सुनते ही हाथी का हृदय भाव से भर गया । उसने अपना शरीर नीचा करके शिर आपके चरणों में रखा और सूँड से चरण छूकर प्रणाम किया ।
(क्रमशः)

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