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*देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*सत्त्वगुण से ईश्वर-लाभ । इन्द्रियसंयम के उपाय ।*
"तमोगुण का स्वभाव अहंकार है । अहंकार, अज्ञान, यह सब तमोगुण से होता है ।
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"पुराणों में है, रावण में रजोगुण था, कुम्भकर्ण में तमोगुण और विभीषण में सतोगुण । इसीलिए विभीषण श्रीरामचन्द्रजी को पा सके थे । तमोगुण का एक और लक्षण है क्रोध । क्रोध में उचित और अनुचित का ज्ञान नहीं रहता । हनुमान ने लंका जला दी, परन्तु यह ज्ञान नहीं था कि इससे सीताजी की कुटी भी जल जायेगी ।
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"तमोगुण का एक लक्षण और है, काम । पथरियाघट्टे के गिरीन्द्र घोष ने कहा था, 'काम, क्रोध आदि रिपु जब कि नहीं हटने के, तो इनका मोड़ फेर दो ।' ईश्वर की कामना करो । सच्चिदानन्द के साथ रमण करो । क्रोध अगर न जाता हो तो भक्ति का तम धारण करो ।
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'क्या ! मैंने उनका नाम लिया और मेरा उद्धार न होगा ? मुझे फिर पाप कैसा ? बन्धन कैसा ?' ईश्वर की प्राप्ति के लिए लोभ करो । ईश्वर के रूप पर मुग्ध हो जाओ । अगर अहंकार करना है तो इस तरह का अहंकार करो, ‘मैं ईश्वर का दास हूँ, मैं ईश्वर का पुत्र हैं ।’ इस तरह छहों रिपुओं का मोड़ फेर दिया जाता है ।"
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'डाक्टर - इन्द्रियों का संयम करना बड़ा कठिन है । घोड़े की आँख के दोनों बगल आड़ लगायी जाती है, किसी किसी घोड़े की आँखें बिलकुल बन्द कर दी जाती हैं ।
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श्रीरामकृष्ण – अगर एक बार भी उनकी कृपा हो जाय, एक बार भी अगर ईश्वर के दर्शन मिल जायँ, आत्मा का साक्षात्कार हो जाय, तो फिर कोई भय नहीं रह जाता । छहों रिपु फिर कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते ।
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"नारद और प्रह्लाद जैसे नित्यसिद्ध महापुरुषों को उस तरह दोनों ओर से आँखों में आड़ लगाने की आवश्यकता नहीं थी । जो लड़का स्वयं ही बाप का हाथ पकड़कर खेत की मेड़ पर से चल रहा है, वह, सम्भव है, असावधानी के कारण पिता का हाथ छोड़कर गड्ढे में गिर पड़े, परन्तु पिता जिस लड़के का हाथ पकड़ता है, वह कभी गढ्ढे में नहीं गिरता ।"
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डाक्टर - परन्तु बच्चे का हाथ बाप पकड़े यह अच्छा नहीं मालूम होता ।
श्रीरामकृष्ण - बात ऐसी नहीं । महापुरुषों का स्वभाव बालकों जैसा होता है । ईश्वर के पास वे सदा ही बालक हैं, उनमें अहंकार नहीं है । उनकी सब शक्ति ईश्वर की शक्ति है, पिता की शक्ति है, अपनी स्वयं की शक्ति कुछ भी नहीं । यही उनका दृढ़ विश्वास है ।
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डाक्टर - घोड़े के दोनों ओर आँखों में आड़ लगाये बिना क्या घोड़ा कभी बढ़ना चाहता है ? रिपुओं को वशीभूत किये बिना क्या ईश्वर कभी मिल सकते हैं ?
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श्रीरामकृष्ण - तुम जो कुछ कहते हो, उसे विचार-मार्ग कहते हैं – ज्ञानयोग । उस रास्ते से भी ईश्वर मिलते हैं । ज्ञानी कहते हैं, पहले चित्त की शुद्धि आवश्यक है । साधना चाहिए तब ज्ञान होता है ।
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“भक्तिमार्ग से भी वे मिलते हैं । यदि ईश्वर के पादपद्मों में एक बार भक्ति हो, यदि उनका नाम लेने में जी लगे तो फिर प्रयत्न करके इन्द्रियों का संयम नहीं करना पड़ता । रिपु आप ही आप वशीभूत हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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